Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 701

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ऋ꣣त꣡स्य꣢ जि꣣ह्वा꣡ प꣢वते꣣ म꣡धु꣢ प्रि꣣यं꣢ व꣣क्ता꣡ पति꣢꣯र्धि꣣यो꣢ अ꣣स्या꣡ अदा꣢꣯भ्यः । द꣡धा꣢ति पु꣣त्रः꣢ पि꣣त्रो꣡र꣢पी꣣च्यां꣢३꣱ ना꣡म꣢ तृ꣣ती꣢य꣣म꣡धि꣢ रोच꣣नं꣢ दि꣣वः꣢ ॥७०१

ऋ꣣त꣡स्य꣢ । जि꣣ह्वा꣢ । प꣣वते । म꣡धु꣢꣯ । प्रि꣣य꣢म् । व꣣क्ता꣢ । प꣡तिः꣢꣯ । धि꣣य꣢ । अ꣡स्याः꣢ । अ꣡दा꣢꣯भ्यः । अ । दा꣣भ्यः । द꣡धा꣢꣯ति । पु꣣त्रः꣢ । पु꣣त् । त्रः꣢ । पि꣣त्रोः꣢ । अ꣣पीच्य꣢म् । ना꣡म꣢꣯ । तृ꣣ती꣡य꣢म् । अ꣡धि꣢꣯ । रो꣣चन꣢म् । दि꣣वः꣢ ॥७०१॥

Mantra without Swara
ऋतस्य जिह्वा पवते मधु प्रियं वक्ता पतिर्धियो अस्या अदाभ्यः । दधाति पुत्रः पित्रोरपीच्यां३ नाम तृतीयमधि रोचनं दिवः ॥७०१

ऋतस्य । जिह्वा । पवते । मधु । प्रियम् । वक्ता । पतिः । धिय । अस्याः । अदाभ्यः । अ । दाभ्यः । दधाति । पुत्रः । पुत् । त्रः । पित्रोः । अपीच्यम् । नाम । तृतीयम् । अधि । रोचनम् । दिवः ॥७०१॥

Samveda - Mantra Number : 701
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
इस मन्त्र में सोम को सुपुत्र के समान यशस्कर होने से वर्णन किया गया है कि— (ऋतस्य) सत्यभूत यज्ञ की (जिह्वा) जिह्वा =अग्नि की लपट से (वक्ता) चटाचट शब्द करने वाला, (अस्याः धियः पतिः) इस यज्ञ कर्म का पालक (अदाभ्यः) नष्ट न करने योग्य सोम (प्रियम्) प्यारे (मधु) रस को (पवते) प्राप्त कराता है। [इससे] (दिवः) द्युलोक के (अधिरोचनम्) अधिकता ते प्रकाश (नाम) ख्याति = यश को (दधाति) धारण करता है। जैसे(पुत्रः) वेटा (पित्रोः) माता पिता के बीच (तृतीयम्) तीसरे (अपीच्यम्) छिपे हुए नाम को धारण करता है।
जिस प्रकार माता का एक नाम, पिता का दूसरा और पुत्र का तीसरा जो कि विख्यात होने से पूर्व अन्य साधारणों को ज्ञात नहीं है, होता है। फिर जब पुत्र अपने गुणों को जतलाता हुआ प्रकाश करता है, तब प्रसिद्ध होता है। इसी प्रकार अन्तरिक्ष लोक और पृथिवी लोक का पुत्रतुल्य यह सोम भी सोमयाग से पूर्व ऐसा होता है, जिसके गुणों की महिमा लोगों को प्रकट नहीं होती, परन्तु सोमयाग में होम किया जाता है, तब अन्तरिक्ष और पृथिवी के मध्य में प्रकाशमान अपने तीसरे नाम को प्राप्त हुआ प्रकाशित होता है। यह अग्नि की लपट से गीला होने के कारण चट-चटाता है, तो श्रोताओं को ऐसा प्रिय प्रतीत होता है, जैसा बालक का ललित भाषण सुखदायक होता है॥
Footnote
ऋ० ८। ७५। २ में रोचने=रोचनं पाठ है॥