Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 70

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣न्धे꣢꣫ राजा꣣ स꣢म꣣र्यो꣡ नमो꣢꣯भि꣣र्य꣢स्य꣣ प्र꣡ती꣢क꣣मा꣡हु꣢तं घृ꣣ते꣡न꣢ । न꣡रो꣢ ह꣣व्ये꣡भि꣢रीडते स꣣बा꣢ध꣡ आ꣡ग्निरग्र꣢꣯मु꣣ष꣡सा꣢मशोचि ॥७०॥

इ꣣न्धे꣢ । रा꣡जा꣢꣯ । सम् । अ꣣र्यः꣢ । न꣡मो꣢꣯भिः । य꣡स्य꣢꣯ । प्र꣡ती꣢꣯कम् । आ꣡हु꣢꣯तम् । आ । हु꣣तम् । घृते꣡न꣢ । न꣡रः꣢꣯ । ह꣣व्ये꣡भिः꣢ । ई꣣डते । स꣣बा꣡धः꣢ । स꣣ । बा꣡धः꣢꣯ । आ । अ꣣ग्निः꣢ । अ꣡ग्र꣢꣯म् । उ꣣ष꣡सा꣢म् । अ꣣शोचि ॥७०॥

Mantra without Swara
इन्धे राजा समर्यो नमोभिर्यस्य प्रतीकमाहुतं घृतेन । नरो हव्येभिरीडते सबाध आग्निरग्रमुषसामशोचि ॥

इन्धे । राजा । सम् । अर्यः । नमोभिः । यस्य । प्रतीकम् । आहुतम् । आ । हुतम् । घृतेन । नरः । हव्येभिः । ईडते । सबाधः । स । बाधः । आ । अग्निः । अग्रम् । उषसाम् । अशोचि ॥७०॥

Samveda - Mantra Number : 70
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यस्य) जिस परमात्मा का (प्रतीकम्) स्वरूप (घृतेन) प्रकाश से (आहुतम्) सब ओर से व्याप्त है। और जिसकी (सबाधः) योगयज्ञ के ऋत्विज् (नरः) लोग (हव्येभिः) भक्ति रूप हव्यों के साथ (ईडते) स्तुति करते हैं। और जो (नमोभिः) नमस्कार वा प्रणामों से (सम्-इन्द्वे) हृदय में भले प्रकार प्रकाश करता है। वह (राजा) तेजोमय (अर्य्यः) चराऽचर का स्वामी (अग्निः) परमात्मा (उषसाम्, अग्रम्) उषःकाल में (आ, अशोचि) [उपासकों के हृदय में] सर्वतः पवित्रता करे।
मनुष्यों को उचित है कि प्रातःकाल उठ कर परमप्रकाश, उपासकों से ध्याये हुए, सर्वाध्यक्ष, सर्वपूज्य, परमात्मा का ध्यान करें। जिससे वह अन्तःकरण को पवित्र करे और अविद्या की निवृत्ति द्वारा सर्वदुःख दूर हों॥
भौतिक पक्ष में—(यस्य) जिस अग्नि का (प्रतीकम्) स्वरूप (घृतेन) घृतादि हव्य से (आहुतम्) सब ओर से होम द्वारा हुत किया गया है। और जिस को (सबाधः) ऋत्विज् (नरः) लोग (हव्येभिः) होमने योग्य पदार्थों के साथ (ईडते) मन्त्रोक्त वर्णित करते हैं। और जो (नमोभिः) अन्न अर्थात् स्थालीपाकादि चरू से (सम्-इन्द्धे) सम्यक् प्रदीप्त होता है। वह (राजा) देदीप्यमान (अर्यः) यज्ञ का स्वामी (अग्निः) प्रसिद्ध अग्नि (उषसाम्-अग्रम्) प्रातः काल ही (आ, अशोचि) सर्वतः पवित्र करे।
उक्तगुणयुक्त अग्नि में नित्य प्रातःकाल उठते ही होम करना चाहिये जिससे वायु, जल, घर, बाहर को पवित्र शुद्ध स्वच्छ करे॥
Footnote
अष्टाध्यायी ३।१।१०३ निघण्टु ३।१८॥ उणादि ३। ८९ इत्यादि के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद ७।८।१ में “अग्निरग्र” पाठ है॥