Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 7

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
ए꣢ह्यू꣣ षु꣡ ब्रवा꣢꣯णि꣣ ते꣡ऽग्न꣢ इ꣣त्थे꣡त꣢रा꣣ गि꣡रः꣢ । ए꣣भि꣡र्व꣢र्धास꣣ इ꣡न्दु꣢भिः ॥७॥

आ꣢ । इ꣣हि । उ । सु꣢ । ब्र꣡वा꣢꣯णि । ते꣣ । अ꣡ग्ने꣢꣯ । इ꣣त्था꣢ । इ꣡त꣢꣯राः । गि꣡रः꣢꣯ । ए꣣भिः꣢ । व꣣र्धासे । इ꣡न्दु꣢꣯भिः ॥७॥

Mantra without Swara
एह्यू षु ब्रवाणि तेऽग्न इत्थेतरा गिरः । एभिर्वर्धास इन्दुभिः ॥

आ । इहि । उ । सु । ब्रवाणि । ते । अग्ने । इत्था । इतराः । गिरः । एभिः । वर्धासे । इन्दुभिः ॥७॥

Samveda - Mantra Number : 7
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे अग्ने (एहि ) आओ (ते) तुम्हारे द्वारा (इत्था) सत्य [वैदिक ] और (इतराः) अन्य लौकिक ( गिरः) वाणियों को (सु, ब्रवाणि) उच्चारण करूँ । और तुम (एभिः ) इन ( इन्दुभिः) यज्ञों से (वद्धासि) बढ़ते हो ॥
तात्पर्य यह है कि लौकिक वैदिक सब प्रकार की वाणी अग्नि ही की सहायता से बोली जाती है क्योंकि वाक् इन्द्रिय का अग्नि देवता है वा यह समझिये कि वाक् इन्द्रिय अग्नि का प्रधान कार्य है । इसी से “मुख से अग्नि उत्पन्न हुआ” यह , यजुः ३१। १२ में तथा “शब्द स्पर्श और रूप ये तीन अग्नि के गुण हैं” यह महाभारत शान्तिपर्व अध्याय १८४ श्लोक ३२ में कहा गया है (मूल प्रमाण संस्कृत भाष्य में देखो ) वह अग्नि यज्ञों से बढ़ता है इसलिये यज्ञानुष्ठान से वागिन्द्रिय का सुधार भी जतलाया गया है । क्योंकि सदा वाणी आदि सब इन्द्रियां अपने-अपने नियमानुकूल निज-निज अग्नि आदि भौतिक देव का ग्रहण करते रहते हैं और इसी से समस्त व्यवहार की सिद्धि है ।
ईश्वर विषय में—भी यही अर्थ होगा कि (अग्ने) ज्ञानदातः परमात्मन् ! (एहि ) हमें प्राप्त होओ (ते) तुम्हारे द्वारा ही, मैं (इत्था) सत्य [ वैदिक ] (इतराः) और लौकिक (गिरः) वाणियों को (सु, ब्रवाणि) भले प्रकार बोलू और आप (एभिः ) इन ( इन्दुभिः) ब्रह्मयज्ञों से (वर्धासि) हमें बढ़ाते हैं ॥
अर्थात् ईश्वरदत्त वेदवाणी के ही द्वारा मनुष्यों ने लौकिक वैदिक शब्द बोलने का सामर्थ्य प्राप्त किया है और वेदपाठ वा परमात्मा की स्तुति प्रार्थनोपासना आदि ज्ञान यज्ञों के करने से जो हमारा बोलने का ज्ञान बढ़ता है, उसे परमात्मा ही बढ़ाता है ॥
Footnote
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