Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 699

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अन्धीगुः श्यावाश्विः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तं꣢ दु꣣रो꣡ष꣢म꣣भी꣢꣫ नरः꣣ सो꣡मं꣢ वि꣣श्वा꣡च्या꣢ धि꣣या꣢ । य꣣ज्ञा꣡य꣢ स꣣न्त्व꣡द्र꣢यः ॥६९९॥

तम् । दु꣣रो꣡ष꣢म् । अ꣣भि꣢ । न꣡रः꣢꣯ । सो꣡म꣢꣯म् । वि꣣श्वा꣡च्या꣢ । धि꣣या꣢ । य꣣ज्ञा꣡य꣢ । स꣣न्तु । अ꣡द्र꣢꣯यः । अ । द्र꣣यः ॥६९९॥

Mantra without Swara
तं दुरोषमभी नरः सोमं विश्वाच्या धिया । यज्ञाय सन्त्वद्रयः ॥

तम् । दुरोषम् । अभि । नरः । सोमम् । विश्वाच्या । धिया । यज्ञाय । सन्तु । अद्रयः । अ । द्रयः ॥६९९॥

Samveda - Mantra Number : 699
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(तम्) पूर्वोक्त विशेषणों वाले (यज्ञाय दुरोषम्) यज्ञ के लिये कठिनाई से फूंकने वाले (सोमम्) सोमरस को (नरः) यज्ञ के नेता ऋत्विज् लोग (विश्वाच्या) विश्वव्यापिनी (धिया) क्रिया [होम] से (अभि) सब ओर [फैलावें] (अद्रयः सन्तु) जिससे मेघ होवें॥
घृतादि की अपेक्षा गीला सोमरस कठिनाई से फुंकता है, इसलिये उसका “दुरोषम्” विशेषण प्रयुक्त किया गया है।
Footnote
ऋ० ९। १०१। ३ का पाठान्तर संस्कृतभाष्य में देखिये॥