Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 69

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
आ꣢ वो꣣ रा꣡जा꣢नमध्व꣣र꣡स्य꣢ रु꣣द्र꣡ꣳ होता꣢꣯रꣳ सत्य꣣य꣢ज꣣ꣳ रो꣡द꣢स्योः । अ꣣ग्निं꣢ पु꣣रा꣡ त꣢नयि꣣त्नो꣢र꣣चि꣢त्ता꣣द्धि꣡र꣢ण्यरूप꣣म꣡व꣢से कृणुध्वम् ॥६९॥

आ꣢ । वः꣣ । रा꣡जा꣢꣯नम् । अ꣣ध्वर꣡स्य꣢ । रु꣣द्र꣢म् । हो꣡ता꣢꣯रम् । स꣣त्यय꣡ज꣢म् । स꣣त्य । य꣡ज꣢꣯म् । रो꣡द꣢꣯स्योः । अ꣣ग्नि꣢म् । पु꣣रा꣢ । त꣣नयित्नोः꣢ । अ꣣चि꣡त्ता꣢त् । अ꣣ । चि꣡त्ता꣢꣯त् । हि꣡र꣢꣯ण्यरूपम् । हि꣡र꣢꣯ण्य । रू꣣पम् । अ꣡व꣢꣯से । कृ꣣णुध्वम् ॥६९॥

Mantra without Swara
आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रꣳ होतारꣳ सत्ययजꣳ रोदस्योः । अग्निं पुरा तनयित्नोरचित्ताद्धिरण्यरूपमवसे कृणुध्वम् ॥

आ । वः । राजानम् । अध्वरस्य । रुद्रम् । होतारम् । सत्ययजम् । सत्य । यजम् । रोदस्योः । अग्निम् । पुरा । तनयित्नोः । अचित्तात् । अ । चित्तात् । हिरण्यरूपम् । हिरण्य । रूपम् । अवसे । कृणुध्वम् ॥६९॥

Samveda - Mantra Number : 69
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! (वः) तुम्हारे (तनयित्नोः) बिजुली के तुल्य (अचित्तात्) मृत्यु से (पुरा) पहिले ही (अध्वरस्य, राजानम्) योगयज्ञ के, राजा (होतारम्) कर्मफलदाता (रुद्रम्) पापियों को रोदन कराने वाले (रोदस्योः) द्यावापृथिवी के मध्य में (सत्ययजम्) सच्चा यज्ञ करने वाले (हिरण्यरूपम्) ज्योतिःस्वरूप (अग्निम्) प्रकाशमान परमात्मा को (अवसे) रक्षा के लिये (आकृणुध्वम्) बुलाओ॥
अर्थात् बिजुली के समान मृत्यु शिर पर गर्जता है उससे पूर्व ही तुम लोग उक्तगुणयुक्त परमात्मा के शरण में प्राप्त हो जायो, पीछे पछताओगे।
भौतिक पक्ष में— हे मनुष्यो ! (वः) तुम्हारे (तनयित्नोः, प्रचित्तात्, पुरा) विद्युत् तुल्य, मृत्यु के, पूर्व ही (अध्वरस्य, राजानम्) कर्मकाण्ड के, राजा (होतारम्) हव्य ले जाने वाले (रोदस्योः, सत्ययजम्) द्युलोक और पृथिवी के बीच में, यथार्थ देवयजन करने वाले (हिरण्यरूपम्) तेजोयुक्त (रुद्रम्) प्रचण्ड (अग्निम्) अग्नि का (अवसे) रोगादि शत्रुओं से बचने के लिये (आ-कृणुध्वम्) आधान करो॥
अर्थात् मनुष्यो ! तुमको मृत्युपर्यन्त उक्तगुणयुक्त अग्नि का स्थापन करके यज्ञ करना चाहिये, मरने पर क्या बन पड़ेगा ! यह अग्निहोत्र रोगादि की शान्ति वाय्वादि की शुद्धि करके मृत्यु से बचाने वाला है॥
Footnote
निघण्टु ३।३० का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद ४।३।१ में भी सर्वथा ऐसा ही पाठ है॥