Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 688

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कलिः प्रागाथः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
न꣢꣫ यं दु꣣ध्रा꣡ वर꣢꣯न्ते꣣ न꣢ स्थि꣣रा꣢꣫ मुरो꣣ म꣡दे꣢षु शि꣣प्र꣡मन्ध꣢꣯सः । य꣢ आ꣣दृ꣡त्या꣢ शशमा꣣ना꣡य꣢ सुन्व꣣ते꣡ दाता꣢꣯ जरि꣣त्र꣢ उ꣣꣬क्थ्य꣢꣯म् ॥६८८॥

न । यम् । दु꣣ध्राः꣢ । व꣡र꣢꣯न्ते । न । स्थि꣣राः꣢ । मु꣡रः꣢꣯ । म꣡देषु꣢꣯ । शि꣣प्र꣢म् । अ꣡न्ध꣢꣯सः । यः । आ꣣दृ꣡त्य꣢ । आ꣣ । दृ꣡त्य꣢꣯ । श꣣शमाना꣡य꣢ । सु꣣न्वते꣢ । दा꣡ता꣢꣯ । ज꣣रित्रे꣢ । उ꣣क्थ्य꣢म् ॥६८८॥

Mantra without Swara
न यं दुध्रा वरन्ते न स्थिरा मुरो मदेषु शिप्रमन्धसः । य आदृत्या शशमानाय सुन्वते दाता जरित्र उक्थ्यम् ॥

न । यम् । दुध्राः । वरन्ते । न । स्थिराः । मुरः । मदेषु । शिप्रम् । अन्धसः । यः । आदृत्य । आ । दृत्य । शशमानाय । सुन्वते । दाता । जरित्रे । उक्थ्यम् ॥६८८॥

Samveda - Mantra Number : 688
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यम्) जिस (उक्थ्यम्) स्तुतियोग्य (शिप्रम्) जैसे नासिका सुगन्ध-दुर्गन्ध का ज्ञान कराती है तद्वत् इष्ट-अनिष्ट का बोध कराने वाले इन्द्र परमात्मा को (न स्थिराः) चञ्चल चित्त वाले (दुध्राः) दुर्धर (मुरः) मनुष्य (न) नहीं (वरन्ते) स्वीकार करते और (यः) जो परमात्मा (आदृत्य) आदर पूर्वक (सुन्वते) यज्ञार्थ सोम का अभिषव करने वाले (शशमानाय) गान रहित शस्त्र मन्त्रों से स्तुति करने वाले और (जरित्रे) गानयुक्त स्तोत्रों से स्तुति करने वाले के लिये (अन्धसः) अन्नादि का (दाता) देने वाला है [उसको पुकारता हूँ] यह पूर्व मन्त्र से सम्बन्ध जानिये॥
Footnote
निरुक्त ६। १७ और निघण्टु ३। १६ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ संहिता में “मदेषु, शिप्रम्” ऐसा पाठ है और पदपाठकार ने भी इसी प्रकार पदच्छेद किया है, परन्तु सायणाचार्य और उनका बिना सोचे अनुकरण करने वालों में ऋग्वेद ८। ६६। २ में “मदे, सुशिप्रम्” पाठ है उसी के अनुसार यहाँ भी मूल से विरुद्ध की व्याख्या कर दी है॥