Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 683

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
क꣡स्त्वा꣢ स꣣त्यो꣡ मदा꣢꣯नां꣣ म꣡ꣳहि꣢ष्ठो मत्स꣣द꣡न्ध꣢सः । दृ꣣ढा꣡ चि꣢दा꣣रु꣢जे꣣ व꣡सु꣢ ॥६८३॥

कः꣡ । त्वा꣣ । सत्यः꣢ । म꣡दा꣢꣯नाम् । म꣡ꣳहि꣢꣯ष्ठः । म꣣त्सत् । अ꣡न्ध꣢꣯सः । दृ꣣ढा꣢ । चि꣣त् । आरु꣡जे꣢ । आ꣣ । रु꣡जे꣢꣯ । व꣡सु꣢꣯ ॥६८३॥

Mantra without Swara
कस्त्वा सत्यो मदानां मꣳहिष्ठो मत्सदन्धसः । दृढा चिदारुजे वसु ॥

कः । त्वा । सत्यः । मदानाम् । मꣳहिष्ठः । मत्सत् । अन्धसः । दृढा । चित् । आरुजे । आ । रुजे । वसु ॥६८३॥

Samveda - Mantra Number : 683
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
परमात्मा राजा को उपदेश करता है कि — हे राजन् ! इन्द्र ! (दृढा) दृढ़ (चित्) भी (वसु) शत्रु के वास करने की जगह दुर्गादि के (आरुजे) तोड़ने को (मदानाम्) हृष्टिकारक पदार्थों में (मंहिष्ठः) उत्तम (सत्यः) सच्चा हृष्टिकारक (कः) क्या पदार्थ (त्वा) तुझको (मत्सत्) हृष्ट करे ? उत्तर — (अन्धसः) अन्न का [निघं ० २। ७]॥
अर्थात् राजा वा राजपुरुषों को शत्रु के दुर्गादि तोड़ने के योग्य हृष्टि-पुष्टि की प्राप्ति के लिये केवल अन्न का ही सच्चा मद = हर्ष ग्रहण करना चाहिये, कोई अन्य मद्यादि वस्तु नहीं। पूर्व मन्त्र में जो परमात्मा से प्राण और इन्द्रियों का बल पुरुषार्थ मांगा गया था उसका यह उत्तर परमात्मा की ओर से है कि अन्न से ही यह सब कुछ प्राप्त करो॥
Footnote
ऋ० ४। ३१। २ में भी॥