Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 68

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
वि꣢꣫ त्वदापो꣣ न꣡ पर्व꣢꣯तस्य पृ꣣ष्ठा꣢दु꣣क्थे꣡भि꣢रग्ने जनयन्त दे꣣वाः꣢ । तं꣢ त्वा꣣ गि꣡रः꣢ सुष्टु꣣त꣡यो꣢ वाजयन्त्या꣣जिं꣡ न गि꣢꣯र्व꣣वा꣡हो꣢ जिग्यु꣣र꣡श्वाः꣢ ॥६८॥

वि꣢ । त्वत् । आ꣡पः꣢꣯ । न । प꣡र्व꣢꣯तस्य । पृ꣣ष्ठा꣢त् । उ꣣क्थे꣡भिः꣢ । अ꣣ग्ने । जनयन्त । दे꣣वाः꣢ । तम् । त्वा꣣ । गि꣡रः꣢꣯ । सु꣣ष्टु꣡तयः꣢ । सु꣣ । स्तुत꣡यः꣢ । वा꣣जयन्ति । आजि꣢म् । न । गि꣣र्ववा꣡हः꣢ । गि꣣र्व । वा꣡हः꣢꣯ । जि꣣ग्युः । अ꣡श्वाः꣢꣯ ॥६८॥

Mantra without Swara
वि त्वदापो न पर्वतस्य पृष्ठादुक्थेभिरग्ने जनयन्त देवाः । तं त्वा गिरः सुष्टुतयो वाजयन्त्याजिं न गिर्ववाहो जिग्युरश्वाः ॥

वि । त्वत् । आपः । न । पर्वतस्य । पृष्ठात् । उक्थेभिः । अग्ने । जनयन्त । देवाः । तम् । त्वा । गिरः । सुष्टुतयः । सु । स्तुतयः । वाजयन्ति । आजिम् । न । गिर्ववाहः । गिर्व । वाहः । जिग्युः । अश्वाः ॥६८॥

Samveda - Mantra Number : 68
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) अग्ने ! (देवाः) विद्वान् लोग (उक्थेभिः) वेदवाक्यों द्वारा (त्वत्) तुझ से (विः) विविध अस्त्रादि को (जनयन्त) उत्पन्न करते हैं। (न) जैसे (पर्वतस्य, पृष्ठात्) मेघ के, पृष्ठ से (आपः) [मेघस्थ] जल, (वि) अनेकविध विद्योतमान बिजुलियों को उत्पन्न करते हैं, तद्वत्। (तं, त्वा) उस, तुझ [अग्नि] को (सुष्टुतयः, गिरः) शोभन स्तुतिरूप, वेदवाणियें (वाजयन्ति) बलिष्ठ करती हैं। और तब (न) जैसे (गिर्ववाहः) कहने में ले चलने वाले (अश्वाः) घोड़े (आजिम्) संग्राम को (जिग्युः) जोतते हैं [तद्वत् तू संग्राम को जीतता है]॥
तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार मेघस्थ जल अपने में से विविध प्रकार चमकने वाली बिजुलियों को उत्पन्न करते हैं। इसी प्रकार विद्वान् लोग भी वेदवाक्यों से अग्नि के गुणों को जान कर तदनुसार अनुभव करके अनेकविध अस्त्रों को अग्नि से उत्पन्न करें। क्योंकि वेद के वचन उस अग्नि को वलवान् करते हैं अर्थात् ऐसी रीति बताते हैं जिसके द्वारा आग्नेय बल उत्पन्न हो जावे। और जैसे कहने में चलने वाले घोड़ों के द्वारा युद्ध में दूरस्थ शत्रुओं को शीघ्र जीत सकते हैं, इसी प्रकार यह अग्नि भी अपने बल से अस्त्रादि रूप में परिणत हुआ, दूरस्थ शत्रुओं का पराजय करके अपना जय कराता है॥
Footnote
निघं० १।१०॥ २।९॥ उणादि ३।११०॥ शतपथ ब्राह्मण॥ अष्टाध्यायी ३।४।६ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद ६।२४।६ में “उक्थेभिरिन्द्रानयन्त यज्ञैः। तं त्वाभि सुष्टुतिभिवाजयन्त प्राजि न जग्मुर्गिर्वाहो अश्वाः” ऐसा पाठ और अर्थ में भी भेद है तथा इन्द्र देवता है॥