Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 676

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सप्तर्षयः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
दु꣣हान꣡ ऊध꣢꣯र्दि꣣व्यं꣡ मधु꣢꣯ प्रि꣣यं꣢ प्र꣣त्न꣢ꣳ स꣣ध꣢स्थ꣣मा꣡स꣢दत् । आ꣣पृ꣡च्छ्यं꣢ ध꣣रु꣡णं꣢ वा꣣꣬ज्य꣢꣯र्षसि꣣ नृ꣡भि꣢र्धौ꣣तो꣡ वि꣢चक्ष꣣णः꣢ ॥६७६॥

दु꣣हा꣢नः । ऊ꣡धः꣢꣯ । दि꣣व्य꣢म् । म꣡धु꣢꣯ । प्रि꣣य꣢म् । प्र꣣त्न꣢म् । स꣣ध꣡स्थ꣢म् । स꣣ध꣢ । स्थ꣡म् । आ꣢ । अ꣣सदत् । आ꣣पृ꣡च्छ्य꣢म् । आ꣣ । पृ꣡च्छ्य꣢꣯म् । ध꣣रु꣢ण꣣म् । वा꣣जी꣢ । अ꣣र्षसि । नृ꣡भिः꣢꣯ । धौ꣡तः꣢ । वि꣣चक्षणः꣢ । वि꣣ । चक्षणः꣢ ॥६७६॥

Mantra without Swara
दुहान ऊधर्दिव्यं मधु प्रियं प्रत्नꣳ सधस्थमासदत् । आपृच्छ्यं धरुणं वाज्यर्षसि नृभिर्धौतो विचक्षणः ॥

दुहानः । ऊधः । दिव्यम् । मधु । प्रियम् । प्रत्नम् । सधस्थम् । सध । स्थम् । आ । असदत् । आपृच्छ्यम् । आ । पृच्छ्यम् । धरुणम् । वाजी । अर्षसि । नृभिः । धौतः । विचक्षणः । वि । चक्षणः ॥६७६॥

Samveda - Mantra Number : 676
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(विचक्षणः) चतुर बुद्धिमान् (धौतः) शुद्धान्तःकरण (वाजी) योगबलयुक्त पुरुष, (ऊधः) आनन्द के स्रोत परमात्मा से (दिव्यम्) अलौकिक (प्रियम्) प्यारे (प्रत्नम्) सनातन (सधस्थम्) वास्तव में सदा साथ रहने वाने (मधु) माधुर्य रस को (दुहानः) दुहता हुआ (आसदत्) पाता है। फिर (आ पृच्छम्) बूझने योग्य ! (धरुणम्) धारक परमात्मा को (नृभिः) योग सिखाने वाले नेताओं के साथ वह शिष्य (अर्षसि) प्राप्त होता है॥
यद्वा — (विचक्षणः) चतुर (धौतः) स्नानादि से शुद्ध शरीर वाला (वाजी) हव्य अन्न युक्त यजमान, (ऊधः) सोमलता से (दिव्यम्) उत्तम (प्रियम्) प्यारे (प्रत्नम्) पुराने पके हुए (सधस्थम्) लता के साथ रहने वाले (आपृच्छयम्) उसके जानने वालों से बूझने योग्य (धरुणम्) स्थिरता करने वाले (मधु) मधुर रस को (दुहानः) निचोड़ता हुआ (आसदत्) पाता और (नृभिः) ऋत्विजों महित (अर्षसि) हवन करता है॥
Footnote
रौरव से लेकर कण्वबृहत् पर्यन्त ४२ साम इस मूक्त में से निकले हैं। ऋ० ९। १०५। ५ में (धूतः) पाठ है। गौवों के बाख को ऊधः कहते हैं क्योंकि उस में से दूध दुहा जाता है। इसी प्रकार यहां परमात्मा को आनन्द के स्रोत होने से तथा सोमलता को रस का स्रोत से ऊधः कहा है॥