Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 671

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्र꣢म꣣ग्निं꣡ क꣢वि꣣च्छ꣡दा꣢ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ जू꣣त्या꣡ वृ꣢णे । ता꣡ सोम꣢꣯स्ये꣣ह꣡ तृ꣢म्पताम् ॥६७१॥

इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣ग्नि꣢म् । क꣣विच्छ꣡दा꣢ । क꣣वि । छ꣡दा꣢꣯ । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ । जू꣣त्या꣢ । वृ꣣णे । ता꣢ । सो꣢म꣢꣯स्य । इ꣡ह꣢ । तृ꣣म्पताम् ॥६७१॥

Mantra without Swara
इन्द्रमग्निं कविच्छदा यज्ञस्य जूत्या वृणे । ता सोमस्येह तृम्पताम् ॥

इन्द्रम् । अग्निम् । कविच्छदा । कवि । छदा । यज्ञस्य । जूत्या । वृणे । ता । सोमस्य । इह । तृम्पताम् ॥६७१॥

Samveda - Mantra Number : 671
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यज्ञस्य) यज्ञ के (जूत्या) सेवन के लिये (कविच्छदा) बुद्धिमानों की अनुकूलता करने वाले (इन्द्रम्, अग्निम्) इन्द्र और अग्नि इन दोनों का (वृणे) वरण=स्वीकार करता हूँ। (ता) वे दोनों (इह) इस यज्ञ में (सोमस्य) सोम के पान से (तृम्यताम्) तृप्त हों॥
Footnote
यह ऐन्द्राग्न आज्य है और “यह प्रातः सवन समाप्त हुआ” ऐसा विवरणकार का मत है॥ “ये प्रातः सवन में गायत्र साम से गाये हुए चार आर्यस्तोत्र कहाते हैं” मीमां० जै० ९। ४।३ “जो कि आजि को प्राप्त होते हैं यह आज्यों का आज्यत्व है” यह आज्य का निर्वचन ताण्ड्यमहाब्राह्मण ७। २ में देखिये॥ इन आज्यस्तोत्रों में पञ्चदशनामक स्तोम बनता है जिसका बताने वाला ताण्ड्यब्राह्मण २। ४। ५। ६ में देखिये॥ यह स्तोम द्वितीय पृष्ठ्य भी कहाता है॥ ऋ०३। १२। ३ में भी॥