Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 67

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
मू꣣र्धा꣡नं꣢ दि꣣वो꣡ अ꣢र꣣तिं꣡ पृ꣢थि꣣व्या꣡ वै꣢श्वान꣣र꣢मृ꣣त꣢꣫ आ जा꣣त꣢म꣣ग्नि꣢म् । क꣣वि꣢ꣳ स꣣म्रा꣢ज꣣म꣡ति꣢थिं꣣ ज꣡ना꣢नामा꣣स꣢न्नः꣣ पा꣡त्रं꣢ जनयन्त दे꣣वाः꣢ ॥६७॥

मू꣣र्धान꣢म् । दि꣣वः꣢ । अ꣣रति꣢म् । पृ꣣थिव्याः꣢ । वै꣣श्वानर꣢म् । वै꣣श्व । नर꣢म् । ऋ꣣ते꣢ । आ । जा꣣त꣢म् । अ꣣ग्नि꣢म् । क꣣वि꣢म् । स꣣म्रा꣡ज꣢म् । स꣣म् । रा꣡ज꣢꣯म् । अ꣡ति꣢꣯थिम् । ज꣡ना꣢꣯नाम् । आ꣣स꣢न् । नः꣣ । पा꣡त्र꣢꣯म् । ज꣣नयन्त । देवाः꣢ ॥६७॥

Mantra without Swara
मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आ जातमग्निम् । कविꣳ सम्राजमतिथिं जनानामासन्नः पात्रं जनयन्त देवाः ॥

मूर्धानम् । दिवः । अरतिम् । पृथिव्याः । वैश्वानरम् । वैश्व । नरम् । ऋते । आ । जातम् । अग्निम् । कविम् । सम्राजम् । सम् । राजम् । अतिथिम् । जनानाम् । आसन् । नः । पात्रम् । जनयन्त । देवाः ॥६७॥

Samveda - Mantra Number : 67
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(देवाः) विद्वान् ऋत्विज् लोग (नः ऋते) हमारे, यज्ञ में (पृथिव्याः, दिवः, मूर्धानम्, अरतिम्) पृथिवी से, द्युलोक के, ऊर्ध्वं भाग को जाने वाले (वैश्वानरम्) सब मनुष्यों के हितकारी (जातम्) उत्पन्न (कविम्) दिखाने वाले (सम्राजम्) दहकते हुए (अतिथिम्) सदा चलने वाले (जनानां, पात्रम्) प्राणियों के, रक्षक (आसन्) [देवों के] मुख (अग्निम्) अग्नि को (आ, जनयन्त) सब ओर से प्रकट करें॥
अग्नि, पृथिवी से हृव्य लेकर ऊपर द्युलोक को जाता, वहाँ जाकर वायु जलादि की पवित्रता द्वारा मनुष्यों का हित करता, उत्पन्न होकर प्रकाश से दिखाने का काम करता, स्वयं प्रकाशित होता, सदा ऊपर को चलता ही रहता, प्राणियों की रक्षा करता और वायु आदि देवों का मुख है, इसी से वे हव्य पदार्थ खाते हैं। इस प्रकार के अग्नि को अपने यज्ञ में विद्वान् ऋत्विजों से स्थापित कराके यज्ञ करना चाहिये॥
Footnote
उणादि ४।५९,६०॥ ३।८९॥ ४॥२॥ ४। १५९॥ निघं० ५। ४॥ अष्टाध्यायी ६।१।६३॥ ७।१।३९ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद ६।७।१ में “आसन्ना पात्रम्” ऐसा पाठ है॥