Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 665

1875 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- विश्वामित्रो गाथिनो जमदग्निर्वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
गृ꣣णाना꣢ ज꣣म꣡द꣢ग्निना꣣ यो꣡ना꣢वृ꣣त꣡स्य꣢ सीदतम् । पा꣣त꣡ꣳ सोम꣢꣯मृतावृधा ॥६६५॥

गृणाना꣢ । ज꣣म꣡द꣢ग्निना । ज꣣म꣢त् । अ꣣ग्निना । यो꣡नौ꣢꣯ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । सी꣣दतम् । पात꣢म् । सो꣡म꣢꣯म् । ऋ꣣तावृधा । ऋत । वृधा ॥६६५॥

Mantra without Swara
गृणाना जमदग्निना योनावृतस्य सीदतम् । पातꣳ सोममृतावृधा ॥

गृणाना । जमदग्निना । जमत् । अग्निना । योनौ । ऋतस्य । सीदतम् । पातम् । सोमम् । ऋतावृधा । ऋत । वृधा ॥६६५॥

Samveda - Mantra Number : 665
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
मित्र और वरुण संज्ञक आकाशगत देव = वायुविशेष वा अवस्थाविशेषापन्न सूर्यकिरण (गुणाना) वेदमन्त्रों से वर्णित किये जाते हुए (ऋतस्य) जल के (योनौ) स्थान = गगनमण्डल में (सीदतम्) स्थित हों तथा (जमदग्निना) जाज्वल्यमान दहकते अग्नि से हूयमान (सोमम्) सोमादि ओषधिरस को (पातम्) पीवें। उससे (ऋतावृधा) वृष्टिजल के बढ़ाने वाले हों॥
Footnote
ऋ० ३। ६२। १८ में भी॥