Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 664

1875 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- विश्वामित्रो गाथिनो जमदग्निर्वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣣रुश꣡ꣳसा꣢ नमो꣣वृ꣡धा꣢ म꣣ह्ना꣡ दक्ष꣢꣯स्य राजथः । द्रा꣣घि꣢ष्ठाभिः शुचिव्रता ॥६६४॥

उ꣣रुश꣡ꣳसा꣢ । उ꣣रु । श꣡ꣳसा꣢꣯ । न꣣मोवृ꣡धा꣢ । न꣣मः । वृ꣡धा꣢꣯ । म꣣हा꣢ । द꣡क्षस्य꣢꣯ । रा꣣जथः । द्रा꣡घि꣢꣫ष्ठाभिः । शुचिव्रता । शुचि । व्रता ॥६६४॥

Mantra without Swara
उरुशꣳसा नमोवृधा मह्ना दक्षस्य राजथः । द्राघिष्ठाभिः शुचिव्रता ॥

उरुशꣳसा । उरु । शꣳसा । नमोवृधा । नमः । वृधा । महा । दक्षस्य । राजथः । द्राघिष्ठाभिः । शुचिव्रता । शुचि । व्रता ॥६६४॥

Samveda - Mantra Number : 664
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(उरुशंसा) बहुत वर्णनीय गुण कर्म स्वभाव वाले (नमोवृधा) हव्यरूपी अन्न से बढ़ने वाले (शुचिव्रता) शुद्धिकारक मित्र और वरुण नामक मध्यस्थान वृष्टिकारक देव (दक्षस्य मह्ना) बल की बड़ाई से (द्राघिष्ठामि) अत्यन्त लम्बी बिजुलियों के साथ (राजथः) विराजते हैं।
Footnote
निघण्टु २। ७॥ २। ९॥ २। १॥ ३। १ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ३। ६२। १७ में भी॥