Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 66

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhand- जगती Swara- निषादः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣म꣢꣫ꣳ स्तो꣣म꣡मर्ह꣢ते जा꣣त꣡वे꣢दसे र꣡थ꣢मिव꣣ सं꣡ म꣢हेमा मनी꣣ष꣡या꣢ । भ꣣द्रा꣢꣫ हि नः꣣ प्र꣡म꣢तिरस्य स꣣ꣳस꣡द्यग्ने꣢꣯ स꣣ख्ये꣡ मा रि꣢꣯षामा व꣣यं꣡ तव꣢꣯ ॥६६॥

इ꣣म꣢म् । स्तो꣡मम꣢꣯म् । अ꣡र्ह꣢꣯ते । जा꣣त꣡वे꣢दसे । जा꣣त꣢ । वे꣣दसे । र꣡थ꣢꣯म् । इ꣣व । स꣢꣯म् । म꣣हेम । मनीष꣡या꣢ । भ꣣द्रा꣢ । हि । नः꣣ । प्र꣡म꣢꣯तिः । प्र । म꣣तिः । अस्य । सँस꣡दि꣢ । सम् । स꣡दि꣢꣯ । अ꣡ग्ने꣢꣯ । स꣣ख्ये꣢ । स꣣ । ख्ये꣢ । मा । रि꣣षाम । वय꣢म् । त꣡व꣢꣯ ॥६६॥

Mantra without Swara
इमꣳ स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषया । भद्रा हि नः प्रमतिरस्य सꣳसद्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव ॥

इमम् । स्तोममम् । अर्हते । जातवेदसे । जात । वेदसे । रथम् । इव । सम् । महेम । मनीषया । भद्रा । हि । नः । प्रमतिः । प्र । मतिः । अस्य । सँसदि । सम् । सदि । अग्ने । सख्ये । स । ख्ये । मा । रिषाम । वयम् । तव ॥६६॥

Samveda - Mantra Number : 66
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वयम्) हम उपासक लोग (इमम्, स्तोभम्) इस स्तोत्र के (अर्हते) योग्य (जातवेदसे) वेद प्रकाश परमात्मा को (मनीषया) सूक्ष्म बुद्धि से (रथमिव) रथ के समान (सम्महेमा) चढ़ावें। (अस्य) इस परमात्मा की (संसदि) ध्यानशाला में (नः) हमारी (प्रमतिः) पवित्र बुद्धि (भद्रा, हि) सुधरती ही है। (अग्ने) हे ज्योतिःस्वरूप ! (तब) आपकी (सख्ये) अनुकूलता में (मा)(रिषामा) दुःखी होवें॥
तात्पर्य यह है कि परमात्मा उक्त प्रकार की स्तुति के योग्य है और हमको उचित है कि उसका वेद की श्रुतियों से थोड़ा सा श्रवण करके फिर अपनी बुद्धि से उसे बढ़ावें अर्थात् जिस प्रकार थोड़े से चलाये हुए रथ को फिर अपनी बुद्धि से सारथि नवीन मार्गों में भी चला सकता है इसी प्रकार परमात्मविषयक ज्ञान की वृद्धि करें। क्योंकि उसके शरण में रखने से बुद्धि उज्ज्वल होती है और हिंसा दि सब दुःख दोष दूर होते हैं॥
भौतिक पक्ष में—(वयम्) हम याज्ञिक वा शिल्पी लोग (इमम्, स्तोमम्) इस, वेदोक्त गुणवर्णन के (अर्हते) योग्य (जातवेदसे) अग्नि को (मनीषया) बुद्धि से (रथमिव) रथ के समान (सम्महेमा) बढ़ावें (अस्य) इस अग्नि के (संसदि) यज्ञस्थल पर (नः) हमारी (प्रमतिः) शुद्ध बुद्धि (भद्रा, हि) सुधरती ही है। (अग्ने) अग्ने ! (तव) तेरी (सख्ये) अनुकूलता में (मा)(रिषाम) दुःखी होवें॥
अग्नि स्तुतियोग्य अर्थात् इस वेदोक्त रीति से वर्णन करने के योग्य है। हम को उचित है कि इसके गुणों को बुद्धि से बढ़ावें अर्थात् थोड़ा वेद से सुन कर फिर अपनी बुद्धि और अनुभव से उस विषय में ज्ञान बढ़ावें। इस अग्नि के वर्णन रूप स्तोत्र से बुद्धि तीव्र होती है तथा इसके गुणों को जान कर सुप्रयोग करने से हिंसादि दु:ख निवृत्त होते हैं॥
Footnote
अष्टाध्यायी ६।३।१३७ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥