Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 659

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- शतं वैखानसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡च्छा꣢ समु꣣द्र꣢꣫मिन्द꣣वो꣢ऽस्तं꣣ गा꣢वो꣣ न꣢ धे꣣न꣡वः꣢ । अ꣡ग्म꣢न्नृ꣣त꣢स्य꣣ यो꣢नि꣣मा꣢ ॥६५९॥

अ꣡च्छ꣢꣯ । स꣣मु꣢द्रम् । स꣣म् । उ꣢द्रम् । इ꣡न्द꣢꣯वः । अ꣡स्त꣢꣯म् । गा꣡वः꣢꣯ । न । धे꣣न꣡वः꣢ । अ꣡ग्म꣢꣯न् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । यो꣡नि꣢꣯म् । आ ॥६५९॥

Mantra without Swara
अच्छा समुद्रमिन्दवोऽस्तं गावो न धेनवः । अग्मन्नृतस्य योनिमा ॥

अच्छ । समुद्रम् । सम् । उद्रम् । इन्दवः । अस्तम् । गावः । न । धेनवः । अग्मन् । ऋतस्य । योनिम् । आ ॥६५९॥

Samveda - Mantra Number : 659
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्दवः) शान्तस्वभाव भगवदुपासक लोग (ऋतस्य योनिम्) सत्य वेद के धाम (समुद्रम्) समुद्रतुल्य गम्भीर परमात्मा को (अच्छ) भले प्रकार सानन्द (आ अग्मन्) प्राप्त होते हैं। दृष्टान्त (न) जैसे (धेनवः गावः) दुधार गौवें (स्तम्) घर को [जहां से गई थी] प्राप्त होती हैं।
यद्वा — (इन्दवः) सोम (ऋतस्य योनिम्) यज्ञ के स्थान (समुद्रम्) अन्तरिक्ष को (अच्छ आ अग्मन्) भले प्रकार सब ओर से प्राप्त होते हैं (धेनवः) दुघार (गावः) गौवें (न) जैसे (अस्तम्) दूध देने को घर आती हैं तद्वत्॥
Footnote
निघण्टु १। ३॥ ३। ४ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ९। १। १२ में भी॥
इस अवसर में श्री सत्यव्रत सामश्रमी जी कहते हैं कि “विवरणकार यहां ज्योतिष्टोमसम्बन्धी वहिष्पवमान समाप्त लिखते हैं। और मीमांसा द० ९।४। ३ में लिखा है कि यह तीन सूक्तों के गान से साध्य स्तोत्र बहिष्पवमान कहाता है। क्योंकि उनमें की ऋचायें पवमानार्थ हैं और बाहर से सम्वन्ध है। यह स्तोत्र अन्य स्तोत्रों के समान सदस् नामक मण्डप के भीतर उदुम्बर की स्तम्बशाखा के समीप नहीं पढ़ा जाता, किन्तु सदस् से बाहर चलते हुए इसे पढ़ते हैं। बहिष्पवमान नामक वेदी वह है, जहां स्थित होकर इस वहिष्णवमान नाम ९ नव ऋचाओं में साध्य त्रिवृत् नामक स्तोम का पूर्व पाठ करके मार्जन होता है और वह वेदी उदग्वंशा नाम शाला के अन्तर्गत सदोमण्डप के पश्चिम की ओर प्राचीनवंशा नाम शाला के अन्तर्गत ऐष्टिक वेदी से उत्तर की ओर होती है और इस बहिष्पवमान के प्रकृतियाग अग्निष्टोमादि में त्रिवृत् नामक स्तोम होता है।” इत्यादि॥
इस त्रिवृत् की व्याख्या ताण्ड्य महाब्राह्मण प्रपाठक २ के ३ खण्डों के अनुसार हम पूर्व मन्त्र सं० १६४ (पृ० ११२—११३ में) कर चुके हैं॥