Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 656

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ऋ꣣ध꣡क्सो꣢म स्व꣣स्त꣡ये꣢ संजग्मा꣣नो꣢ दि꣣वा꣡ क꣢वे । प꣡व꣢स्व꣣ सू꣡र्यो꣢ दृ꣣शे꣢ ॥६५६॥

ऋ꣣ध꣢क् । सो꣣म । स्व꣣स्त꣡ये꣢ । सु꣣ । अस्त꣡ये꣢ । सं꣣जग्मानः꣢ । स꣣म् । जग्मानः꣢ । दि꣣वा꣢ । क꣣वे । प꣡व꣢꣯स्व । सू꣡र्यः꣢꣯ । दृ꣣शे꣢ ॥६५६॥

Mantra without Swara
ऋधक्सोम स्वस्तये संजग्मानो दिवा कवे । पवस्व सूर्यो दृशे ॥

ऋधक् । सोम । स्वस्तये । सु । अस्तये । संजग्मानः । सम् । जग्मानः । दिवा । कवे । पवस्व । सूर्यः । दृशे ॥६५६॥

Samveda - Mantra Number : 656
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(कवे) बुद्धितत्त्व के बढ़ाने जगाने वाले ! (सोम) सोम ! (ऋधक्) चढ़ता बढ़ता हुआ (दिवा) और आकाश से संगत होता हुआ (सूर्यः) जैसे सूर्य (दृशे) दृष्टि की सहायता के लिए चढ़ता है वैसे तु भी (स्वस्तये) सुख के लिये (पवस्व) हम से हवन किया हुआ आकाश को प्राप्त हो॥
जैसे दृष्टि के लिए सूर्य प्रकाश में चढ़ता है वैसे सुख के लिए सोम का हवन कर आकाश में चढ़ाना चाहिए॥
Footnote
विवरणकार की सम्मति, निरुक्त ४। २५ का प्रमाण और ऋ० ९। ६४। ३० का पाठान्तर संस्कृतभाष्य में देखिये॥