Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 652

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣢ ते꣣ म꣡धु꣢ना꣣ प꣡योऽथ꣢꣯र्वाणो अशिश्रयुः । दे꣣वं꣢ दे꣣वा꣡य꣢ देव꣣यु꣢ ॥६५२॥

अ꣡भि꣢ । ते꣣ । म꣡धु꣢꣯ना । प꣡यः꣢꣯ । अ꣡थ꣢꣯र्वाणः । अ꣣शिश्रयुः । देव꣢म् । दे꣣वा꣡य꣢ । दे꣣व꣢यु ॥६५२॥

Mantra without Swara
अभि ते मधुना पयोऽथर्वाणो अशिश्रयुः । देवं देवाय देवयु ॥

अभि । ते । मधुना । पयः । अथर्वाणः । अशिश्रयुः । देवम् । देवाय । देवयु ॥६५२॥

Samveda - Mantra Number : 652
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(ते) वे (अथर्वाणः) स्थिरात्मा ज्ञानी लोग (देवाय) ईश्वरप्राप्ति के लिए (देवम्) दिव्यगुणयुक्त (देवयु) परमात्मदेव को चाहने वाले (पयः) प्राणरूपी अन्न को (मधुना) आत्मज्ञानानन्द रूपी मिठाई से (अभिअशिश्रयुः) संस्कृत करते हैं।
अथवा — (ते अथर्वाणः) वे ऋत्विज् अध्वर्यु आदि लोग (देवाय) वायु आदि देवगण के लिए (देवम्) दिव्य (पयः) सोम रस को (मधुना) मिठाई से (अभि अशिश्रयुः) संस्कृत करते हैं।
Footnote
शतपथ ब्राह्मण १४। ५। ५। १४, १६, १७, १८, १९॥ १२। ८। १। २० निघण्टु ५। ५ निरुक्त ११। १८ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋग्वेद ९। ११। २ में भी॥