Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 650

1875 Mantra
Devata- लिङ्गोक्ताः Rishi- प्रजापतिः Chhand- पदपङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ए꣣वा꣢ह्येऽ३ऽ३ऽ३व꣡ । ए꣣वा꣡ ह्य꣢ग्ने । ए꣣वा꣡ही꣢न्द्र । ए꣣वा꣡ हि पू꣢꣯षन् । ए꣣वा꣡ हि दे꣢꣯वाः ॐ ए꣣वा꣡हि दे꣢꣯वाः ॥६५०

ए꣣व꣢ । हि । ए꣣व꣢ । ए꣢व । हि । अ꣣ग्ने । एव꣢ । हि । इ꣣न्द्र । एव꣢ । हि । पू꣣षन् । एव꣢ । हि । दे꣣वाः । ॐ ए꣣वा꣡हिदे꣢꣯वाः ॥६५०॥

Mantra without Swara
एवाह्येऽ३ऽ३ऽ३व । एवा ह्यग्ने । एवाहीन्द्र । एवा हि पूषन् । एवा हि देवाः ॐ एवाहि देवाः ॥६५०

एव । हि । एव । एव । हि । अग्ने । एव । हि । इन्द्र । एव । हि । पूषन् । एव । हि । देवाः । ॐ एवाहिदेवाः ॥६५०॥

Samveda - Mantra Number : 650

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
व पांच पुरीष पदों की व्याख्या करते हैं। ये सब इन्द्र देवता के हैं। क्योंकि इन्द्र का सम्बन्ध पीछे से चला आता है और यहाँ भी तीसरे पद में इन्द्र शब्द आया है। शेष अग्नि आदि नाम भी इस कारण इन्द्र = परमेश्वर के ही समझने चाहिये जैसा कि निरुक्त ७। १८ में लिखा है कि “इसी महान् अग्नि महान् आत्मा एक आत्मा को विद्वान् लोग इन्द्र मित्र वरुण अग्नि दिव्य गरुत्मान् आदि नामों से बहुत प्रकार वर्णन करते हैं।” उनमें से प्रथम पद — (एव, हि, एव) जैसा कि पूर्वार्ध में वर्णन कर आये, वह ठीक है। द्वितीय पद — (अग्ने, एव, हि) हे प्रकाशस्वरूप और प्रकाशकर्त्ता ! ऐसा ही आपका वर्णन है जैसा पूर्व कहा। तृतीय पद—(इन्द्र एव हि) हे परमेश्वर्यवन् ! ऐसा ही है। चतुर्थ पद — (पूषन्, एव, हि) हे पालक पोषक ! ऐसा ही है। पञ्चम पद = (देवाः) हे पूर्वोक्त देवो ! (एव हि) यथोक्त ही आपके गुण कर्म स्वभाव और प्रशंसा है।
Footnote
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