Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 65

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- बृहदुक्थो वामदेव्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣दं꣢ त꣣ ए꣡कं꣢ प꣣र꣡ उ꣢ त꣣ ए꣡कं꣢ तृ꣣ती꣡ये꣢न꣣ ज्यो꣡ति꣢षा꣣ सं꣡ वि꣢शस्व । सं꣣वे꣡श꣢नस्त꣣न्वे꣢३꣱चा꣡रु꣢रेधि प्रि꣣यो꣢ दे꣣वा꣡नां꣢ पर꣣मे꣢ ज꣣नि꣡त्रे꣢ ॥६५॥

इ꣣द꣢म् । ते꣣ । ए꣡क꣢꣯म् । प꣣रः꣢ । उ꣣ । ते । ए꣡क꣢꣯म् । तृ꣣ती꣡ये꣢न । ज्यो꣡ति꣢꣯षा । सम् । वि꣣शस्व । संवे꣡श꣢नः । स꣣म् । वे꣡श꣢꣯नः । त꣡न्वे꣢꣯ । चा꣡रुः꣢꣯ । ए꣣धि । प्रियः꣢ । दे꣣वा꣡ना꣢म् । प꣣रमे꣢ । ज꣣नि꣡त्रे꣢ ॥६५॥

Mantra without Swara
इदं त एकं पर उ त एकं तृतीयेन ज्योतिषा सं विशस्व । संवेशनस्तन्वे३चारुरेधि प्रियो देवानां परमे जनित्रे ॥

इदम् । ते । एकम् । परः । उ । ते । एकम् । तृतीयेन । ज्योतिषा । सम् । विशस्व । संवेशनः । सम् । वेशनः । तन्वे । चारुः । एधि । प्रियः । देवानाम् । परमे । जनित्रे ॥६५॥

Samveda - Mantra Number : 65
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
[प्रकरण से अग्ने !] (ते) तेरी (इदम्) यह विद्युद्रूप (एकम्) एक (ऊ) और (ते) तेरी (परः) दूसरी आदित्यरूप (एकम्) एक [ज्योति है] (तृतीयेन) तीसरी पार्थिव (ज्योतिषा) ज्योतिः से (संविशस्व) आधान किया जावे (परमे) श्रेष्ठ (जनित्रे) यज्ञ में (संवेशनः) आधान किया हुआ तू (देवानाम्) वाय्वादि देवों के (तन्वे) देह के लिये (प्रियः) प्यारा और (चारुः) सुशोभित (एधि) होवे॥
जगत् में अग्नि की तीन ज्योतियाँ हैं—१ विद्युत्। २ आदित्य। ३ सामान्य पृथिवी पर की अग्नि। इनमें से तीसरी ज्योति से अग्नि का कुण्ड में आधान होता है और तब वह यज्ञ में स्थित अग्नि, वाय्वादि देवों के शरीरों का सुधार करता है। शोभा और प्रसन्नता को उत्पन्न करता है॥ सायणाचार्य ने इसके भाष्य में वाजिनामक बृहदुक्थ के मृतपुत्र की कथा लिखी है परन्तु यहाँ उसका लेश भी मूल में नहीं है।
Footnote
उणादि १।८० और ४।१५९ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद १०।५६।१ में “संवेशने तन्वश्चारुः” ऐसा पाठ हैं॥