Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 648

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रजापतिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
पू꣡र्व꣢स्य꣣ य꣡त्ते꣢ अद्रिवो꣣ꣳऽशु꣢꣯र्मदा꣢꣯य । सु꣣म्न꣡ आ धे꣢꣯हि नो वसो पू꣣र्तिः꣡ श꣢विष्ठ शस्यते । व꣣शी꣢꣫ हि श꣣क्रो꣢ नू꣣नं꣡ तन्नव्य꣢꣯ꣳ सं꣣न्य꣡से꣢ ॥६४८

पू꣡र्व꣢꣯स्य । यत् । ते꣣ । अद्रिवः । अ । द्रिवः । अँशुः꣢ । म꣡दा꣢꣯य । सु꣣म्ने꣢ । आ । धे꣣हि । नः । वसो । पूर्तिः꣢ । श꣣विष्ठ । शस्यते । व꣣शी꣢ । हि । श꣣क्रः꣢ । नू꣣न꣢म् । तत् । न꣡व्य꣢꣯म् । सं꣣न्य꣡से꣢ ॥६४८॥

Mantra without Swara
पूर्वस्य यत्ते अद्रिवोꣳऽशुर्मदाय । सुम्न आ धेहि नो वसो पूर्तिः शविष्ठ शस्यते । वशी हि शक्रो नूनं तन्नव्यꣳ संन्यसे ॥६४८

पूर्वस्य । यत् । ते । अद्रिवः । अ । द्रिवः । अँशुः । मदाय । सुम्ने । आ । धेहि । नः । वसो । पूर्तिः । शविष्ठ । शस्यते । वशी । हि । शक्रः । नूनम् । तत् । नव्यम् । संन्यसे ॥६४८॥

Samveda - Mantra Number : 648

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
द्विपदा उपसर्ग को प्रथम कहते हैं—हम उपासक लोग (धनस्य) विद्यादि धन के (सातये) लाभार्थ (अपराजितम्) न हारने वाले किन्तु (जेतारम्) विजय करने वाले (इन्द्रम्) परमैश्वर्ययुक्त को (हवामहे) पुकारते हैं। शक्वरी छन्द का पाद कहते हैं—(सः) वह परमात्मा (नः) हमारे (द्विषः) द्वेष करने वालों को (अति स्वर्षत्) दूर करे (सः) वह (नः) हमारे (द्विषः) द्वेषपात्रों को (अतिस्वर्षत्) दूर करे। इसलिये वेद में ऐसी परिपाटी प्रायः है, जैसा कि [योस्मानद्वेष्टि यं वयं द्विष्मः] इत्यादि से द्वेष्टा और द्वेष्य दोनों के नाश की प्रार्थना आया करती है। (अद्रिवः) हे अखण्डवज्रधर ! (पूर्वस्य ते) सनातन आपके [उपासक हम हैं]। (अंशुः) आपकी किरणरूप ध्यानानन्द का लेश (मदाय) अत्यन्त आनन्द के लिये होता है। वह आप (नः) हमको (सुम्ने) सुख में (आ वेहि) स्थित करें। अब शक्वरी और उपसर्ग भाग को साथ-साथ कहते हैं—(शविष्ट) हे बलिष्ठ ! (पूर्तिः) आप का किया पालन पोषण (शस्यते) प्रशंसित है (हि) क्योंकि (शक्रः) आप सर्वशक्तिमान् (वशी) लोकत्रय को वश में रखने वाले हैं।
अब शाक्वर भाग कहते हैं — (प्रभो) हे प्रभो ! (वृत्रहन्) हे दुष्टनिवारक ! (तत्) इस कारण (नूनम्) निश्चय (नव्यम्) नूतन क्षणभंगुर सांसारिक सुख को (संन्यसे) मैं त्याग करके संन्यासी होता हूँ। जिससे (अर्येषु) संन्यासि स्वामियों में (संब्रवावहै) भले प्रकार एक दूसरे से संवाद करें। अब उपसर्ग भाग में यह कहते हैं कि किस विषय का संवाद करें (यः) जो (शूरः) ज्ञानी (सखा) सबका मित्र (सुशेवः) आनन्दस्वरूप और (अद्वयुः) अद्वितीय है वही (गोषु) पृथिवीं आदि सब लोकों में (गच्छति) व्यापक होकर वर्त्तमान है। उसके विषय में संवाद करें, यह सम्बन्ध जानिये॥
Footnote
निघण्टु ३। ६॥ ३। २८ अष्टाध्यायी ३। १। ८५॥ २। १।४॥ ८। १। ३८॥ ३। १। १०३ उणादि २। २५ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥