Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 647

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रजापतिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इ꣢न्द्रं꣣ ध꣡न꣢स्य꣣ सा꣡त꣢ये हवामहे꣣ जे꣡ता꣢र꣣म꣡प꣢राजितम् । स꣡ नः꣢ स्वर्ष꣣द꣢ति꣣ द्वि꣢षः꣣ स꣡ नः꣢ स्वर्ष꣣द꣢ति꣣ द्वि꣡षः꣢ ॥६४७

इ꣡न्द्र꣢꣯म् । ध꣡न꣢꣯स्य । सा꣣त꣡ये꣢ । ह꣣वामहे । जे꣡ता꣢꣯रम् । अ꣡प꣢꣯राजितम् । अ । प꣣राजितम् । सः꣢ । नः꣣ । स्वर्षत् । अ꣡ति꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ । सः꣢ । नः꣣ । स्वर्षत् । अ꣡ति꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ ॥६४७॥

Mantra without Swara
इन्द्रं धनस्य सातये हवामहे जेतारमपराजितम् । स नः स्वर्षदति द्विषः स नः स्वर्षदति द्विषः ॥६४७

इन्द्रम् । धनस्य । सातये । हवामहे । जेतारम् । अपराजितम् । अ । पराजितम् । सः । नः । स्वर्षत् । अति । द्विषः । सः । नः । स्वर्षत् । अति । द्विषः ॥६४७॥

Samveda - Mantra Number : 647

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
द्विपदा उपसर्ग को प्रथम कहते हैं—हम उपासक लोग (धनस्य) विद्यादि धन के (सातये) लाभार्थ (अपराजितम्) न हारने वाले किन्तु (जेतारम्) विजय करने वाले (इन्द्रम्) परमैश्वर्ययुक्त को (हवामहे) पुकारते हैं। शक्वरी छन्द का पाद कहते हैं—(सः) वह परमात्मा (नः) हमारे (द्विषः) द्वेष करने वालों को (अति स्वर्षत्) दूर करे (सः) वह (नः) हमारे (द्विषः) द्वेषपात्रों को (अतिस्वर्षत्) दूर करे। इसलिये वेद में ऐसी परिपाटी प्रायः है, जैसा कि [योस्मानद्वेष्टि यं वयं द्विष्मः] इत्यादि से द्वेष्टा और द्वेष्य दोनों के नाश की प्रार्थना आया करती है। (अद्रिवः) हे अखण्डवज्रधर ! (पूर्वस्य ते) सनातन आपके [उपासक हम हैं]। (अंशुः) आपकी किरणरूप ध्यानानन्द का लेश (मदाय) अत्यन्त आनन्द के लिये होता है। वह आप (नः) हमको (सुम्ने) सुख में (आ वेहि) स्थित करें। अब शक्वरी और उपसर्ग भाग को साथ-साथ कहते हैं—(शविष्ट) हे बलिष्ठ ! (पूर्तिः) आप का किया पालन पोषण (शस्यते) प्रशंसित है (हि) क्योंकि (शक्रः) आप सर्वशक्तिमान् (वशी) लोकत्रय को वश में रखने वाले हैं।
अब शाक्वर भाग कहते हैं — (प्रभो) हे प्रभो ! (वृत्रहन्) हे दुष्टनिवारक ! (तत्) इस कारण (नूनम्) निश्चय (नव्यम्) नूतन क्षणभंगुर सांसारिक सुख को (संन्यसे) मैं त्याग करके संन्यासी होता हूँ। जिससे (अर्येषु) संन्यासि स्वामियों में (संब्रवावहै) भले प्रकार एक दूसरे से संवाद करें। अब उपसर्ग भाग में यह कहते हैं कि किस विषय का संवाद करें (यः) जो (शूरः) ज्ञानी (सखा) सबका मित्र (सुशेवः) आनन्दस्वरूप और (अद्वयुः) अद्वितीय है वही (गोषु) पृथिवीं आदि सब लोकों में (गच्छति) व्यापक होकर वर्त्तमान है। उसके विषय में संवाद करें, यह सम्बन्ध जानिये॥
Footnote
निघण्टु ३। ६॥ ३। २८ अष्टाध्यायी ३। १। ८५॥ २। १।४॥ ८। १। ३८॥ ३। १। १०३ उणादि २। २५ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥