Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 646

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रजापतिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ई꣢शे꣣ हि꣢ श꣣क्र꣢꣫स्तमू꣣त꣡ये꣢ हवामहे꣣ जे꣡ता꣢र꣣म꣡प꣢राजितम् । स꣡ नः꣢ स्व꣣र्ष꣢द꣣ति द्वि꣢षः꣣ क्र꣢तु꣣श्छ꣡न्द꣢ ऋ꣣तं꣢ बृ꣣ह꣢त् ॥६४६

ई꣡शे꣢꣯ । हि । श꣣क्रः꣢ । तम् । ऊ꣣त꣡ये꣢ । ह꣣वामहे । जे꣡ता꣢꣯रम् । अ꣡प꣢꣯राजितम् । अ । प꣣राजितम् । स꣢ । नः꣣ । स्वर्षत् । अ꣡ति꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ । क्र꣡तुः꣢꣯ । छ꣡न्दः꣢꣯ । ऋ꣣तम् । बृ꣣ह꣢त् ॥६४६॥

Mantra without Swara
ईशे हि शक्रस्तमूतये हवामहे जेतारमपराजितम् । स नः स्वर्षदति द्विषः क्रतुश्छन्द ऋतं बृहत् ॥६४६

ईशे । हि । शक्रः । तम् । ऊतये । हवामहे । जेतारम् । अपराजितम् । अ । पराजितम् । स । नः । स्वर्षत् । अति । द्विषः । क्रतुः । छन्दः । ऋतम् । बृहत् ॥६४६॥

Samveda - Mantra Number : 646

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
प्रथम द्विपदा उपसर्ग कहते हैं — (वाजानाम्) सेनाओं के (पतिः) पति (वशान्) स्वाधीन और (अनु) अनुकूल (भुवः) बनाइये और (राये) धनप्राप्ति के लिये (सुवीर्यम्) सुन्दर पुरुषार्थ को (विदाः) प्राप्त कराइये॥ अब शाक्वर भाग कहते हैं — (मंहिष्ठ) हे अतिसत्कारयोग्य ! (वज्रिन्) शस्त्रों अस्त्रों के घर्त्ता ! (ऋजसे) आप प्रसन्न किये जाते हैं। (यः) जो कि आप (शूराणाम्) शूरवीरों में (शविष्ठः) बलिष्ठ हैं (यः) और जो आप (मघोनाम्) धनवानों में (मंहिष्ठः) अतिदानी हैं॥
अब उपसर्ग भाग कहते हैं — (चिकित्वः) हे ज्ञानवान् ! (अंशुः) सूर्य के (न) तुल्य (शोचिः) प्रकाशयुक्त आप (नः) हमको (अभि) सब ओर से (नय) ले चलिये॥ अब उपसर्ग और शाक्वर दोनों भाग मिलाकर कहते हैं — (इन्द्रः) परमैश्वर्ययुक्त (विदे) प्राप्त होता है (तम्) उस को (उ) ही (स्तुहि) हम स्तुत करते हैं (हि) क्योंकि (शक्रः) वह शक्तिमान् (ईशे) सब को दबा सकता है॥ अब शाक्वर भाग कहते हैं — (तम्) उस (अपराजितम्) न हारने वाले किन्तु (जेतारम्) जीतने वाले को (ऊतये) रक्षार्थ (हवामहे) हम पुकारते हैं (सः) वह (द्विषः) शत्रुओं को (प्रति) लांधकर (नः) हम को (स्वर्षत्) ले जावे॥ अब उपसर्ग फिर कहते हैं—जिससे (क्रतुः) यज्ञ (छन्दः) वेद और (ऋतम्) सत्य (महत्) बहुत हो॥
अर्थात् सेनापति अन्यों को स्वाधीन करे, धनादि ऐश्वर्य के लिये उत्तम पुरुषार्थ को बढ़ावे, शस्त्रास्त्रों का धारक, सत्कारयोग्य, सबको प्रसन्न करने योग्य,बलियों में बलिष्ठ, धनियों में सर्वोत्तम धनी और दाता, ज्ञानवान्, सूर्य के समान तेजस्वी, सेना के पुरुषों का नायक और रक्षक, स्तुतियोग्य, शक्तिमान्, विजयी, न हारने वाला, जहाँ उपद्रव हो वहीं रक्षार्थ जाने वाला और शत्रुओं का भगाने वाला होना चाहिये॥
Footnote
अष्टाध्यायी ७। ३। ८८॥ ८। ३। १॥ ३। २। १३४—१३५ निघण्टु ३। २०॥ २। १०॥ २। १४॥ ३। १० निरुक्त १०। ८ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥