Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 645

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रजापतिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यो꣢꣯ मꣳहि꣢꣯ष्ठो मघोनामꣳशुर्न शोचिः । चि꣡कि꣢त्वो अ꣣भि꣡ नो꣢ न꣣ये꣡न्द्रो꣢ विदे꣢꣯ तमु꣢꣯ स्तुहि ॥६४५

यः꣢ । मँ꣡हि꣢꣯ष्ठः । म꣣घो꣡ना꣢म् । अँ꣣शुः꣢ । न । शो꣣चिः꣢ । चि꣡कि꣢꣯त्वः । अ꣣भि꣢ । नः꣣ । नय । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । वि꣣दे꣢ । तम् । उ꣣ । स्तुहि ॥६४५॥

Mantra without Swara
यो मꣳहिष्ठो मघोनामꣳशुर्न शोचिः । चिकित्वो अभि नो नयेन्द्रो विदे तमु स्तुहि ॥६४५

यः । मँहिष्ठः । मघोनाम् । अँशुः । न । शोचिः । चिकित्वः । अभि । नः । नय । इन्द्रः । विदे । तम् । उ । स्तुहि ॥६४५॥

Samveda - Mantra Number : 645

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
प्रथम द्विपदा उपसर्ग कहते हैं — (वाजानाम्) सेनाओं के (पतिः) पति (वशान्) स्वाधीन और (अनु) अनुकूल (भुवः) बनाइये और (राये) धनप्राप्ति के लिये (सुवीर्यम्) सुन्दर पुरुषार्थ को (विदाः) प्राप्त कराइये॥ अब शाक्वर भाग कहते हैं — (मंहिष्ठ) हे अतिसत्कारयोग्य ! (वज्रिन्) शस्त्रों अस्त्रों के घर्त्ता ! (ऋजसे) आप प्रसन्न किये जाते हैं। (यः) जो कि आप (शूराणाम्) शूरवीरों में (शविष्ठः) बलिष्ठ हैं (यः) और जो आप (मघोनाम्) धनवानों में (मंहिष्ठः) अतिदानी हैं॥
अब उपसर्ग भाग कहते हैं — (चिकित्वः) हे ज्ञानवान् ! (अंशुः) सूर्य के (न) तुल्य (शोचिः) प्रकाशयुक्त आप (नः) हमको (अभि) सब ओर से (नय) ले चलिये॥ अब उपसर्ग और शाक्वर दोनों भाग मिलाकर कहते हैं — (इन्द्रः) परमैश्वर्ययुक्त (विदे) प्राप्त होता है (तम्) उस को (उ) ही (स्तुहि) हम स्तुत करते हैं (हि) क्योंकि (शक्रः) वह शक्तिमान् (ईशे) सब को दबा सकता है॥ अब शाक्वर भाग कहते हैं — (तम्) उस (अपराजितम्) न हारने वाले किन्तु (जेतारम्) जीतने वाले को (ऊतये) रक्षार्थ (हवामहे) हम पुकारते हैं (सः) वह (द्विषः) शत्रुओं को (प्रति) लांधकर (नः) हम को (स्वर्षत्) ले जावे॥ अब उपसर्ग फिर कहते हैं—जिससे (क्रतुः) यज्ञ (छन्दः) वेद और (ऋतम्) सत्य (महत्) बहुत हो॥
अर्थात् सेनापति अन्यों को स्वाधीन करे, धनादि ऐश्वर्य के लिये उत्तम पुरुषार्थ को बढ़ावे, शस्त्रास्त्रों का धारक, सत्कारयोग्य, सबको प्रसन्न करने योग्य,बलियों में बलिष्ठ, धनियों में सर्वोत्तम धनी और दाता, ज्ञानवान्, सूर्य के समान तेजस्वी, सेना के पुरुषों का नायक और रक्षक, स्तुतियोग्य, शक्तिमान्, विजयी, न हारने वाला, जहाँ उपद्रव हो वहीं रक्षार्थ जाने वाला और शत्रुओं का भगाने वाला होना चाहिये॥
Footnote
अष्टाध्यायी ७। ३। ८८॥ ८। ३। १॥ ३। २। १३४—१३५ निघण्टु ३। २०॥ २। १०॥ २। १४॥ ३। १० निरुक्त १०। ८ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥