Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 644

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रजापतिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वि꣣दा꣢ रा꣣ये꣢ सु꣣वी꣢र्यं꣣ भ꣢वो꣣ वा꣡जा꣢नां꣣ प꣢ति꣣र्व꣢शा꣣ꣳ अ꣡नु꣢ । म꣡ꣳहिष्ठ वज्रिन्नृ꣣ञ्ज꣢से꣣ यः꣡ शवि꣢꣯ष्ठः꣣ शू꣡रा꣢णाम् ॥६४४

वि꣣दाः꣢ । रा꣣ये꣢ । सु꣣वी꣡र्य꣣म् । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯म् । भु꣡वः꣢꣯ । वा꣡जा꣢꣯नाम् । प꣡तिः꣢꣯ । व꣡शा꣢꣯न् । अ꣡नु꣢꣯ । मँ꣡हि꣢꣯ष्ठ । व꣣ज्रिन् । ऋञ्ज꣡से꣢ । यः । श꣡वि꣢꣯ष्ठः । शू꣡रा꣢꣯णाम् ॥६४४॥

Mantra without Swara
विदा राये सुवीर्यं भवो वाजानां पतिर्वशाꣳ अनु । मꣳहिष्ठ वज्रिन्नृञ्जसे यः शविष्ठः शूराणाम् ॥६४४

विदाः । राये । सुवीर्यम् । सु । वीर्यम् । भुवः । वाजानाम् । पतिः । वशान् । अनु । मँहिष्ठ । वज्रिन् । ऋञ्जसे । यः । शविष्ठः । शूराणाम् ॥६४४॥

Samveda - Mantra Number : 644

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
प्रथम द्विपदा उपसर्ग कहते हैं — (वाजानाम्) सेनाओं के (पतिः) पति (वशान्) स्वाधीन और (अनु) अनुकूल (भुवः) बनाइये और (राये) धनप्राप्ति के लिये (सुवीर्यम्) सुन्दर पुरुषार्थ को (विदाः) प्राप्त कराइये॥ अब शाक्वर भाग कहते हैं — (मंहिष्ठ) हे अतिसत्कारयोग्य ! (वज्रिन्) शस्त्रों अस्त्रों के घर्त्ता ! (ऋजसे) आप प्रसन्न किये जाते हैं। (यः) जो कि आप (शूराणाम्) शूरवीरों में (शविष्ठः) बलिष्ठ हैं (यः) और जो आप (मघोनाम्) धनवानों में (मंहिष्ठः) अतिदानी हैं॥
अब उपसर्ग भाग कहते हैं — (चिकित्वः) हे ज्ञानवान् ! (अंशुः) सूर्य के (न) तुल्य (शोचिः) प्रकाशयुक्त आप (नः) हमको (अभि) सब ओर से (नय) ले चलिये॥ अब उपसर्ग और शाक्वर दोनों भाग मिलाकर कहते हैं — (इन्द्रः) परमैश्वर्ययुक्त (विदे) प्राप्त होता है (तम्) उस को (उ) ही (स्तुहि) हम स्तुत करते हैं (हि) क्योंकि (शक्रः) वह शक्तिमान् (ईशे) सब को दबा सकता है॥ अब शाक्वर भाग कहते हैं — (तम्) उस (अपराजितम्) न हारने वाले किन्तु (जेतारम्) जीतने वाले को (ऊतये) रक्षार्थ (हवामहे) हम पुकारते हैं (सः) वह (द्विषः) शत्रुओं को (प्रति) लांधकर (नः) हम को (स्वर्षत्) ले जावे॥ अब उपसर्ग फिर कहते हैं—जिससे (क्रतुः) यज्ञ (छन्दः) वेद और (ऋतम्) सत्य (महत्) बहुत हो॥
अर्थात् सेनापति अन्यों को स्वाधीन करे, धनादि ऐश्वर्य के लिये उत्तम पुरुषार्थ को बढ़ावे, शस्त्रास्त्रों का धारक, सत्कारयोग्य, सबको प्रसन्न करने योग्य,बलियों में बलिष्ठ, धनियों में सर्वोत्तम धनी और दाता, ज्ञानवान्, सूर्य के समान तेजस्वी, सेना के पुरुषों का नायक और रक्षक, स्तुतियोग्य, शक्तिमान्, विजयी, न हारने वाला, जहाँ उपद्रव हो वहीं रक्षार्थ जाने वाला और शत्रुओं का भगाने वाला होना चाहिये॥
Footnote
अष्टाध्यायी ७। ३। ८८॥ ८। ३। १॥ ३। २। १३४—१३५ निघण्टु ३। २०॥ २। १०॥ २। १४॥ ३। १० निरुक्त १०। ८ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥