Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 643

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रजापतिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ए꣣वा꣢꣫ हि श꣣क्रो꣢ रा꣣ये꣡ वाजा꣢꣯य वज्रिवः । श꣡वि꣢ष्ठ वज्रिन्नृ꣣ञ्ज꣢से꣣ म꣡ꣳहि꣢ष्ठ वज्रिन्नृ꣣ञ्ज꣢स꣣ । आ꣡ या꣢हि꣣ पि꣢ब꣣ म꣡त्स्व꣢ ॥६४३

ए꣣वा꣢ । हि । श꣣क्रः꣢ । रा꣣ये꣢ । वा꣡जा꣢꣯य । व꣣ज्रिवः । श꣡वि꣢꣯ष्ठ । व꣣ज्रिन् । ऋञ्ज꣡से꣢ । मँ꣡हि꣢꣯ष्ठ । व꣣ज्रिन् । ऋञ्ज꣡से꣢ । आ । या꣣हि । पि꣡ब꣢꣯ । म꣡त्स्व꣢꣯ ॥६४३॥

Mantra without Swara
एवा हि शक्रो राये वाजाय वज्रिवः । शविष्ठ वज्रिन्नृञ्जसे मꣳहिष्ठ वज्रिन्नृञ्जस । आ याहि पिब मत्स्व ॥६४३

एवा । हि । शक्रः । राये । वाजाय । वज्रिवः । शविष्ठ । वज्रिन् । ऋञ्जसे । मँहिष्ठ । वज्रिन् । ऋञ्जसे । आ । याहि । पिब । मत्स्व ॥६४३॥

Samveda - Mantra Number : 643

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
प्रथम उपसर्गभाग द्विपदा का अर्थ कहते हैं—(मघवन्) हे यज्ञवाले ! परमेश्वर ! (विदाः) आप सब जानते हैं (गातुम्) यजमान उपासक के गन्तव्य देश को (विदाः) जानते हैं। इस लिये (दिशः) मार्गों का (अनुशंसिषः) उपदेश कीजिये = बताइये। अब शक्वरी छन्द का भाग कहते हैं (पुरूवसो) हे बहुत विद्यादि धन वाले ! (पूर्वीणां शचीनां पते) हे सनातन बुद्धियों के स्वामिन् ! (आभिः) इन (अभिष्टिभिः) स्तुतियों से (त्वम्) आप (शिक्ष) विद्यादि धन दीजिये क्योंकि आप बहुधन हैं। अब फिर उपसर्ग भाग कहते हैं — (स्वः) सूर्य के (न) तुल्य (अंशुः) व्यापने वालें आप हैं। (प्रचेतन) हे प्रकाशकारक ! (प्रचेतय) कृपया हमें चेताइये। अब दोनों भाग कहते हैं—(हि) क्योंकि (त्वम्) आप (नः) हमारे लिये (इषे) अन्न (द्युम्नाय) और यश के लिये (शक्रः) समर्थ (एव) निश्चय हैं। अब शक्वरी का भाग कहते हैं—(वज्रिवः) हे दुष्टों के ऊपर दण्डधारक ! (राये) धन के लिये और (वाजाय) आत्मिक बल के लिये [प्रसन्न हूजिये] (शविष्ठ) हे बलिष्ठ ! (वज्रिन्) दण्डघर ! (ऋञ्जसे) आप को प्रसन्न किया जाता है। (मंहिष्ठ) हे पूजनीयतम ! (वज्रिन्) वज्र वाले ! (ऋञ्जसे) आपको प्रसन्न किया जाता है॥ अब उपसर्ग भाग द्वारा पूर्वोक्त प्रार्थित परमात्मा प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं कि (आयाहि) आ, और (पिब) अमृत को पी, और (मत्स्व) आनन्दित हो॥
Footnote
अष्टाध्यायी ३। ४। ७॥ ३। ४। ९४ निघण्डु १। १॥ ३। ९। ३। २०॥ २। १८॥ ३। ५ निरुक्त ४। २॥ २। १४॥ ५। ५ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥