Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 641

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रजापतिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वि꣣दा꣡ म꣢घवन् वि꣣दा꣢ गा꣣तु꣢꣯मनु꣢꣯शꣳसिषो꣣ दि꣡शः꣢ । शि꣡क्षा꣢ शचीनां पते पूर्वी꣣णां꣡ पुरू꣢वसो ॥६४१

वि꣣दाः꣢ । म꣣घवन् । विदाः꣢ । गा꣣तु꣢म् । अ꣡नु꣢꣯ । शँ꣣सिषः । दि꣡शः꣢꣯ । शि꣡क्षा꣢꣯ । श꣣चीनाम् । पते । पूर्वीणा꣢म् । पु꣣रूवसो । पुरु । वसो ॥६४१॥

Mantra without Swara
विदा मघवन् विदा गातुमनुशꣳसिषो दिशः । शिक्षा शचीनां पते पूर्वीणां पुरूवसो ॥६४१

विदाः । मघवन् । विदाः । गातुम् । अनु । शँसिषः । दिशः । शिक्षा । शचीनाम् । पते । पूर्वीणाम् । पुरूवसो । पुरु । वसो ॥६४१॥

Samveda - Mantra Number : 641

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
प्रथम उपसर्गभाग द्विपदा का अर्थ कहते हैं—(मघवन्) हे यज्ञवाले ! परमेश्वर ! (विदाः) आप सब जानते हैं (गातुम्) यजमान उपासक के गन्तव्य देश को (विदाः) जानते हैं। इस लिये (दिशः) मार्गों का (अनुशंसिषः) उपदेश कीजिये = बताइये। अब शक्वरी छन्द का भाग कहते हैं (पुरूवसो) हे बहुत विद्यादि धन वाले ! (पूर्वीणां शचीनां पते) हे सनातन बुद्धियों के स्वामिन् ! (आभिः) इन (अभिष्टिभिः) स्तुतियों से (त्वम्) आप (शिक्ष) विद्यादि धन दीजिये क्योंकि आप बहुधन हैं। अब फिर उपसर्ग भाग कहते हैं — (स्वः) सूर्य के (न) तुल्य (अंशुः) व्यापने वालें आप हैं। (प्रचेतन) हे प्रकाशकारक ! (प्रचेतय) कृपया हमें चेताइये। अब दोनों भाग कहते हैं—(हि) क्योंकि (त्वम्) आप (नः) हमारे लिये (इषे) अन्न (द्युम्नाय) और यश के लिये (शक्रः) समर्थ (एव) निश्चय हैं। अब शक्वरी का भाग कहते हैं—(वज्रिवः) हे दुष्टों के ऊपर दण्डधारक ! (राये) धन के लिये और (वाजाय) आत्मिक बल के लिये [प्रसन्न हूजिये] (शविष्ठ) हे बलिष्ठ ! (वज्रिन्) दण्डघर ! (ऋञ्जसे) आप को प्रसन्न किया जाता है। (मंहिष्ठ) हे पूजनीयतम ! (वज्रिन्) वज्र वाले ! (ऋञ्जसे) आपको प्रसन्न किया जाता है॥ अब उपसर्ग भाग द्वारा पूर्वोक्त प्रार्थित परमात्मा प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं कि (आयाहि) आ, और (पिब) अमृत को पी, और (मत्स्व) आनन्दित हो॥
Footnote
अष्टाध्यायी ३। ४। ७॥ ३। ४। ९४ निघण्डु १। १॥ ३। ९। ३। २०॥ २। १८॥ ३। ५ निरुक्त ४। २॥ २। १४॥ ५। ५ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥