Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 64

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- उपस्तुतो वार्हिष्टव्यः Chhand- जगती Swara- निषादः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
चि꣣त्र꣢꣫ इच्छिशो꣣स्त꣡रु꣢णस्य व꣣क्ष꣢थो꣣ न꣢꣫ यो मा꣣त꣡रा꣢व꣣न्वे꣢ति꣣ धा꣡त꣢वे । अ꣣नूधा꣡ यदजी꣢꣯जन꣣द꣡धा꣢ चि꣣दा꣢ व꣣व꣡क्ष꣢त्स꣣द्यो꣡ महि꣢꣯ दू꣣त्यां꣢३꣱च꣡र꣢न् ॥६४॥

चि꣣त्रः꣢ । इत् । शि꣡शोः꣢꣯ । त꣡रु꣢꣯णस्य । व꣣क्षथः꣢ । न । यः । मा꣣त꣡रौ꣢ । अ꣣न्वे꣡ति꣣ । अ꣣नु । ए꣡ति꣢꣯ । धा꣣त꣢꣯वे । अ꣣नूधाः꣢ । अ꣣न् । ऊधाः꣢ । यत् । अ꣡जी꣢꣯जनत् । अ꣡ध꣢꣯ । चि꣣त् । आ꣢ । व꣣व꣡क्ष꣢त् । स꣣द्यः꣢ । स꣣ । द्यः꣢ । म꣡हि꣢꣯ । दू꣣त्य꣢꣯म् । च꣡र꣢꣯न् ॥६४॥

Mantra without Swara
चित्र इच्छिशोस्तरुणस्य वक्षथो न यो मातरावन्वेति धातवे । अनूधा यदजीजनदधा चिदा ववक्षत्सद्यो महि दूत्यां३चरन् ॥

चित्रः । इत् । शिशोः । तरुणस्य । वक्षथः । न । यः । मातरौ । अन्वेति । अनु । एति । धातवे । अनूधाः । अन् । ऊधाः । यत् । अजीजनत् । अध । चित् । आ । ववक्षत् । सद्यः । स । द्यः । महि । दूत्यम् । चरन् ॥६४॥

Samveda - Mantra Number : 64
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
परमात्मा उपदेश करता है कि हे मनुष्य ! (शिशोः) उत्पन्न होते ही (तरुणस्य) युवा के तुल्य काम करने वाले [अग्नि-प्रकरण से] का (वक्षथः) हविः ले जाना (चित्रः इत्) आश्चर्य ही है। (यः) जो कि (धातवे) स्तनपान के लिये (मातरौ) दोनों उत्तरारणि और अधरारणि रूप माताओं को (न,अन्वेति) नहीं, साथ लगता। किन्तु (यत् चित्) जव, ही (अजीजनत्) तुमने उत्पन्न किया (अध, सद्यः) तत्काल ही (अनूषाः) बाख बिना ही (महि, दूत्यम्) भारी दूत का काम (चरन्) करता हुआ (आ—ववक्षत्) हव्य पहुँचाने लगता है॥
तात्पर्य यह है कि जब बालक उत्पन्न होता है तो कुछ काल पर्यन्त बाल्यावस्था में कोई परिश्रम का काम नहीं करता, केवल माता का दुग्ध पीता और पुष्ट होता है। तब पीछे बड़ी अवस्था होने पर काम कर सकता है। परन्तु अग्नि का देवताओं को हव्य पदार्थ पहुँचाना आश्चर्य है, जो शिशु ही तरुण है अर्थात् उत्पन्न होते ही बाख (स्तन) का सेवन बिना किये ही अपनी माता के तुल्य अरणियों में पुष्ट्यर्थ कुछ काल बालक के समान श्रम-रहित वास नहीं करता। किन्तु तुम्हारे रगड़ने से दो अरणियों में उत्पन्न होते ही युवा के तुल्य अपना दूतकर्म अर्थात् वायु आदि देवताओं को हव्य पहुँचाना रूप महत् कर्म करने लगता है।
Footnote
महाभाष्य (३।१।८५ आ० ४॥) अष्टाध्यायी ३। ४॥ ९॥ ८। १। ७१॥ २। २। २४॥ ५।४।१३१॥ ४।४।१२० के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये। पं० ज्वालाप्रसाद भार्गव ने छापे की अशुद्धि जैसी कि कलकत्ते की छपी सायणभाष्ययुक्त पुस्तक में छपी थी त्यों की त्यों उद्धृत करदी, अप्टाध्यायी खोलकर नहीं देखी कि ‘व्यत्ययो बहुलम्’ सूत्र ३।४।९८ पर नहीं है किन्तु ३।१। ८५ पर है। तथा ‘दूत-कर्म’ इस नपुंसक लिङ्ग का अपने संस्कृत में “महान्तम्” यह पुल्लिङ्ग जोड़कर समानाधिकरण कर डाला है। ऋग्वेद १०।११५।१ में पाठ में बहुत अन्तर है संस्कृत में देखिये॥