Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 638

1875 Mantra
Devata- सूर्यः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
उ꣡द्द्यामे꣢꣯षि꣣ र꣡जः꣢ पृ꣣थ्व꣢हा꣣ मि꣡मा꣢नो अ꣣क्तु꣡भिः꣢ । प꣢श्य꣣ञ्ज꣡न्मा꣢नि सूर्य ॥६३८॥

उ꣢त् । द्याम् । ए꣣षि । र꣡जः꣢꣯ । पृ꣣थु꣢ । अ꣡हा꣢꣯ । अ । हा꣣ । मि꣡मा꣢꣯नः । अ꣣क्तु꣡भिः꣢ । प꣡श्य꣢꣯न् । ज꣡न्मा꣢꣯नि । सू꣣र्य ॥६३८॥

Mantra without Swara
उद्द्यामेषि रजः पृथ्वहा मिमानो अक्तुभिः । पश्यञ्जन्मानि सूर्य ॥

उत् । द्याम् । एषि । रजः । पृथु । अहा । अ । हा । मिमानः । अक्तुभिः । पश्यन् । जन्मानि । सूर्य ॥६३८॥

Samveda - Mantra Number : 638
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सूर्य) सूर्य ! वा परमात्मन् ! तू (अहा) दिनों को (अक्तुभिः) रात्रियों से (विमानः) मापता हुआ और (जन्मानि) प्राणियों को (पश्यन्) दिखलाता वा देखता हुआ (पृथु) विस्तृत (द्याम्) आकाश (रज) लोक को (उदेषि) उदय वा प्राप्त हो रहा है॥
दिन रात्रि का विभाग स्पष्ट सूर्याधीन वा परमात्माधीन तो है ही। और तीन लोक के रहने वाले प्रत्येक प्राणी को देखने की सहायता भी वही देता है॥
Footnote
निरुक्त १२। २३ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋ० १। ५०। ७ में भी॥