Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 635

1875 Mantra
Devata- सूर्यः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
त꣣र꣡णि꣢र्वि꣣श्व꣡द꣢र्शतो ज्योति꣣ष्कृ꣡द꣢सि सूर्य । वि꣢श्व꣣मा꣡भा꣢सि रोच꣣न꣢म् ॥६३५॥

त꣣र꣡णिः꣢ । वि꣣श्व꣡द꣢र्शतः । वि꣣श्व꣢ । द꣣र्षतः । ज्योतिष्कृ꣢त् । ज्यो꣣तिः । कृ꣢त् । अ꣣सि । सूर्य । वि꣡श्व꣢꣯म् । आ । भा꣣सि । रोचन꣢म् ॥६३५॥

Mantra without Swara
तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य । विश्वमाभासि रोचनम् ॥

तरणिः । विश्वदर्शतः । विश्व । दर्षतः । ज्योतिष्कृत् । ज्योतिः । कृत् । असि । सूर्य । विश्वम् । आ । भासि । रोचनम् ॥६३५॥

Samveda - Mantra Number : 635
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सूर्य) हे सूर्य ! तू (तरणिः) अन्धकारादि से तिराने वाला है (विश्वदर्शतः) क्योंकि सबको दिखाने वाला है। क्योंकि (ज्योतिष्कृत्) प्रकाश करने वाला (असि) है, (विश्वम्) सब (रोचनम्) चमकते पदार्थ को (आभास) तू ही चमकाता है।
इस पर सायणाचार्य ने भी लिखा है कि “रात्रि में सूर्यास्त होने पर चन्द्रादि पर सूर्य की किरणें गिरकर लौटतीं और अन्धकार को निवृत्त करती हैं। जैसे गृह के द्वार पर दर्पण में सूर्य की किरणें पड़तीं और वहां से लौट कर गृह के भीतर का अन्धकार हटाती हैं, तद्वत्” इससे जाना जाता है कि सूर्य के प्रकाश से चन्द्रादि का प्रकाशित होना विदेशीय आधुनिक विद्वानों का नवीन आविष्कार (ईजाद) नहीं है, किन्तु वैदिक विज्ञान है और सायणाचार्य के समय तक लोग इसको जानते रहे॥
यद्वा—हे (सूर्य) अन्तर्यामी होने से सबके प्रेरक ! परमात्मन् ! (तरणिः) आप संसार समुद्र से तिराने वाले और (विश्वदर्शतः) सब मुमुक्षुवों को देखने = साक्षात् करने योग्य और (ज्योतिष्कृत्) सूर्य चन्द्रादि ज्योतियों के बनाने वाले (असि) हैं। यजुः ३१। १२ में भी लिखा है कि सूर्य चन्द्रादि को परम पुरुष ने उत्पन्न किया। (विश्वम्) सब (रोचनम्) प्रकाशमान जगत् को (आभासि) आप ही प्रकाशित करते हैं। जैसा कि मुण्डकोपनिषद् २।१० और श्वेताश्वतरोनिषद् ६। १४ में कहा है कि “उसी के प्रकाश से सब चमकते हैं” इत्यादि॥
Footnote
सायणभाष्य, यजुः ३१। १३, मुण्डक २। १०, श्वेताश्व० ६। १४, उणादि २। १०२॥ ३। ११० के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
यजुः ३३। ३६ और ऋ० १। ५०। ४ में भी॥