Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 631

1875 Mantra
Devata- सूर्यः Rishi- सार्पराज्ञी Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
अ꣣न्त꣡श्च꣢रति रोच꣣ना꣢꣫स्य प्रा꣣णा꣡द꣢पान꣣ती꣢ । व्य꣢꣯ख्यन्महि꣣षो꣡ दिव꣢꣯म् ॥६३१॥

अ꣣न्त꣡रिति꣢ । च꣣रति । रोचना꣢ । अ꣣स्य꣢ । प्रा꣣णा꣢त् । प्र꣣ । आना꣢त् । अ꣣पानती꣢ । अ꣣प । अनती꣢ । वि । अ꣣ख्यत् । महिषः꣢ । दि꣡व꣢꣯म् ॥६३१॥

Mantra without Swara
अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती । व्यख्यन्महिषो दिवम् ॥

अन्तरिति । चरति । रोचना । अस्य । प्राणात् । प्र । आनात् । अपानती । अप । अनती । वि । अख्यत् । महिषः । दिवम् ॥६३१॥

Samveda - Mantra Number : 631
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अस्य) इस सूर्य की (रोचना) चमक (अन्तः) शरीर के भीतर वा द्युलोक और भुगोल के बीच में (प्राणात्) वायु के ऊर्ध्व गमन से (अपानती) वायु का अधोगमन कराती हुई अथवा उदय से अस्त करती हुई (चरति) विचरती है। ऐसे (महिषः) पृथिवी से बड़ा सूर्य (दिवम्) अन्तरिक्ष को (व्यरयत्) प्रकाशित करता है॥
मुख्य प्राण की प्राण अपान उदान समान व्यान नामक पांच वृत्तियें हैं, उनमें से प्राण को सूर्य की चमक प्रेरित करती तब स्थावर जंगमों के शरीरों में वायु का नीचे ऊपर जाना यदि व्यवहार होता है। शेष स्पष्ट है॥
Footnote
अष्टाध्यायी ३। २। १२४॥ ४। १। ६॥ ६। १। १७३॥ ३। २। १४९॥ ३। ४। ६॥ ३। १। ५२ उणादि १। ४५ निघण्टु ३। ३ निरुक्त ३। १३ के प्रमाण संस्कृतभाग्य में देखिये॥
यजुर्वेद ३। ७ ऋग्वेद १०। १८९। २ में भी॥