Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 63

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- श्यावाश्वो वामदेवो वा Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ जु꣢होता ह꣣वि꣡षा꣢ मर्जय꣣ध्वं नि꣡ होता꣢꣯रं गृ꣣ह꣡प꣢तिं दधिध्वम् । इ꣣ड꣢स्प꣣दे꣡ नम꣢꣯सा रा꣣त꣡ह꣢व्यꣳ सप꣣र्य꣡ता꣢ यज꣣तं꣢ प꣣꣬स्त्या꣢꣯नाम् ॥६३

आ꣢ । जु꣣होत । हवि꣡षा꣢ । म꣣र्जयध्वम् । नि꣢ । हो꣡ता꣢꣯रम् । गृ꣣ह꣡प꣢तिम् । गृ꣣ह꣢ । प꣣तिम् । दधिध्वम् । इडः꣢ । प꣣दे꣢ । न꣡म꣢꣯सा । रा꣣त꣡ह꣢व्यम् । रा꣣त । ह꣣व्यम् । सपर्य꣡त꣢ । य꣣जत꣢म् । प꣣स्त्या꣢꣯नाम् ॥६३॥

Mantra without Swara
आ जुहोता हविषा मर्जयध्वं नि होतारं गृहपतिं दधिध्वम् । इडस्पदे नमसा रातहव्यꣳ सपर्यता यजतं पस्त्यानाम् ॥६३

आ । जुहोत । हविषा । मर्जयध्वम् । नि । होतारम् । गृहपतिम् । गृह । पतिम् । दधिध्वम् । इडः । पदे । नमसा । रातहव्यम् । रात । हव्यम् । सपर्यत । यजतम् । पस्त्यानाम् ॥६३॥

Samveda - Mantra Number : 63
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
परमात्मा उपदेश करता है कि हे मनुष्यो ! तुम (पस्त्यानाम्) घरों में (इडः, पदे) पृथिवी के, ऊपर [कुण्ड में] (गृहपतिम्) घर के रक्षक [अग्नि] का (नि, दधिध्वम्) नितरां आधान करो। (हविषा) घृतादि से (आ—जुहोता) सब ओर से होम करो। (मर्जयध्वम्) [वेदी के इधर—उधर] मार्जन करो। (रातहव्यम्) जिसने हव्य दिया उस (होतारम्) होता नामक ऋत्विज् को (नमसा) नमस्कारादि से (सपर्यता) सत्कृत करो। (यजतम्) इस प्रकार यज्ञ करो। इसमें मनुष्य को यह उपदेश है कि तुम घरों में पृथ्वी पर अग्निकुण्ड में अग्न्याधान करो। घृतादि की आहुति दो। वेदी के समीप मार्जन [शुद्धि] करो। जिस होता आदि से यज्ञकार्य कराओ उसका नमस्कारादि से या अन्नादि द्रव्यों से सत्कार करो। इस प्रकार स्त्री-पुरुष मिलकर यज्ञ किया करो॥
ईश्वर पक्ष में — हे मनुष्यों ! तुम (पस्त्यानाम्) मन्दिरों में (इडः पदे) इडा नाड़ी के अधिष्ठान में (गृहपतिम्) घर आदि के स्वामी परमात्मा का (निदधिध्वम्) नितरां, ध्यान करो। (मर्जयध्वम्) मार्जन अर्थात् देह और आत्मा की शुद्धि करो। (रातहव्यम्) जिसने भक्ति का स्वीकार किया उस (होतारम्) फलप्रदाता की (नमसा) नमस्कार से (सपर्यता) पूजा करो। (यजतम्) इस प्रकार [स्त्री-पुरुष वा गुरु-शिष्य दोनों] उपासना किया करो॥
Footnote
निघं० १।१॥ ३।५॥ ३।४॥ अष्टाध्यायी ६।३।१३३ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥१॥