Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 621

1875 Mantra
Devata- पुरुषः Rishi- नारायणः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
त꣡तो꣢ वि꣣रा꣡ड꣢जायत वि꣣रा꣢जो꣣ अ꣢धि꣣ पू꣡रु꣢षः । स꣢ जा꣣तो꣡ अत्य꣢꣯रिच्यत प꣣श्चा꣢꣫द्भूमि꣣म꣡थो꣢ पु꣣रः꣢ ॥६२१॥

त꣡तः꣢꣯ । वि꣣रा꣢ट् । वि꣣ । रा꣢ट् । अ꣣जायत । वि꣣रा꣢जः । वि꣣ । रा꣡जः꣢꣯ । अ꣡धि꣢꣯ । पू꣡रु꣢꣯षः । सः । जा꣣तः꣢ । अ꣡ति꣢꣯ । अ꣣रिच्यत । पश्चा꣢त् । भू꣡मि꣢꣯म् । अ꣡थ꣢꣯ । उ꣣ । पुरः꣢ ॥६२१॥

Mantra without Swara
ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः । स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥

ततः । विराट् । वि । राट् । अजायत । विराजः । वि । राजः । अधि । पूरुषः । सः । जातः । अति । अरिच्यत । पश्चात् । भूमिम् । अथ । उ । पुरः ॥६२१॥

Samveda - Mantra Number : 621
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(ततः) उस निमित्तकारण पुरुष से (विराट्) ब्रह्माण्डदेह (अजायत) उत्पन्न हुआ करता है (विराजः) ब्रह्माण्ड देह का (अधि) अधिष्ठाता (पूरुषः) परमात्मा होता है (सः) वह (जातः) उत्पन्न हुआ ब्रह्माण्ड देह (पश्चात्) फिर (भूमिम्) पृथिवी (अथो) और (पुरः) ग्राम नगरादि वा प्राणिदेहों को (अत्यरिच्यत) लांघकर वर्तमान रहा करता है। अर्थात् ग्राम नगरादि सब उसके भीतर आ जाते हैं, वह इन सबसे बड़ा होता है।
Footnote
“परमात्मा का कोई कार्य वा कारण नहीं है” इत्यादि प्रमाणों से यह शंका नहीं करनी चाहिए कि इस मन्त्र में वा ऐसे ही अन्य मन्त्रों में परमात्मा से विराट् की उत्पत्ति में परमात्मा उपादान कारण हो।
यजुः ३१। ५ में भी॥ ऋ० १०। ९०। ५ में भी—ततः तस्मात् पाठभेद हैं॥