Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 62

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
स꣡खा꣢यस्त्वा ववृमहे दे꣣वं꣡ मर्ता꣢꣯स ऊ꣣त꣡ये꣢ । अ꣣पां꣡ नपा꣢꣯तꣳ सु꣣भ꣡ग꣢ꣳ सु꣣द꣡ꣳस꣢सꣳ सु꣣प्र꣡तू꣢र्तिमने꣣ह꣡स꣢म् ॥६२॥

स꣡खा꣢꣯यः । स꣢ । खा꣣यः । त्वा । ववृमहे । देवम्꣢ । म꣡र्ता꣢꣯सः । ऊ꣣त꣡ये꣢ । अ꣣पा꣢म् । न꣣पा꣢꣯तम् । सु꣣भ꣡ग꣢म् । सु꣣ । भ꣡ग꣢꣯म् । सु꣣दँ꣡ऽस꣢सम् । सु꣣ । दँ꣡स꣢꣯सम् । सु꣣प्र꣡तू꣢र्तिम् । सु꣣ । प्र꣡तू꣢꣯र्त्तिम् । अ꣣नेह꣡स꣢म् । अ꣣न् । एह꣡स꣢म् ॥६२॥

Mantra without Swara
सखायस्त्वा ववृमहे देवं मर्तास ऊतये । अपां नपातꣳ सुभगꣳ सुदꣳससꣳ सुप्रतूर्तिमनेहसम् ॥

सखायः । स । खायः । त्वा । ववृमहे । देवम् । मर्तासः । ऊतये । अपाम् । नपातम् । सुभगम् । सु । भगम् । सुदँऽससम् । सु । दँससम् । सुप्रतूर्तिम् । सु । प्रतूर्त्तिम् । अनेहसम् । अन् । एहसम् ॥६२॥

Samveda - Mantra Number : 62
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हम (सखायः) मित्र (मर्तासः) मनुष्य (त्वा) आप (देवम्) दिव्यगुणयुक्त (अपान्नपातम्) कर्मों के न गिराने वाले अर्थात् कर्मों के अनुसार याथातथ्य फल देनेवाले, कर्मों का निक्षेप [अमानत वा धरोहर] रखने वाले (सुभगम्) शोभन ऐश्वर्यशाली (सुदंससम्) उत्तम कर्मों के कर्त्ता (सुप्रतूर्त्तिम्) तत्क्षण कार्य करने वाले (अनेहसम्) उपद्रवरहित शान्तस्वरूप परमात्मा को (ऊतये) रक्षा के लिये (ववृमहे) सेवित करते हैं।
मनुष्यों को परस्पर मित्र होकर उक्त गुणयुक्त परमात्मा की स्तुति उपासना करनी चाहिये॥
भौतिक पक्ष में—(सखायः, मर्त्तासः) तुम मित्र, मनुष्य (त्वा, देवम्) तुझ देव (सुभगम्) शोभन ऐश्वर्यकारक (सुदंससम्) शुभ कर्म यज्ञादि के सहायक (सुप्रतूर्त्तिम्) तीव्रतायुक्त (अनेहसम्) उपद्रव की शान्ति करनेवाले (अपान्नपातम्) अग्नि का (ऊतये) रोगादि शत्रुओं से बचने के लिये (ववृमहे) वरण करते हैं॥
अर्थात् उच्च गुणयुक्त अग्नि का सुप्रयोग करके मित्रतापूर्वक काम में लाना चाहिये। अग्नि का नाम “अपान्नपात्” इसलिये है कि यह अप्=जलों का, नपात् = पौत्र वा नाती है। इस विषय में निरुक्त ८।५ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये। जिसका अर्थ यह है कि “तनूनपात्” और “अपान्नपात्” अग्नि को कहते हैं, ऐसा शाकपूणि आचार्य का मत है। क्योंकि अन्तरिक्ष में फैले हुए जल को अप् और तनू कहते हैं, उन जलों का पौत्र अग्नि को इस कारण माना है कि जल से ओषधि वनस्पति और ओषधि वनस्पतियों काष्ठों में से अग्नि उत्पन्न होता है। इसलिये अग्नि जलों का पौत्र=नपात् वा नप्ता है॥
Footnote
निघं० २।१॥ २।१३ के प्रमाण भी संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद ३।९।१ में “सुभगं सुदीदितिम्” ऐसा पाठ है॥