Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 619

1875 Mantra
Devata- पुरुषः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
पु꣡रु꣢ष ए꣣वे꣢꣫दꣳ सर्वं꣣ य꣢द्भू꣣तं꣢꣫ यच्च꣣ भा꣡व्य꣢म् । पा꣡दो꣢ऽस्य꣣ स꣡र्वा꣢ भू꣣ता꣡नि꣢ त्रि꣣पा꣡द꣢स्या꣣मृ꣡तं꣢ दि꣣वि꣢ ॥६१९॥

पु꣡रु꣢꣯षः । ए꣣व꣢ । इ꣣द꣢म् । स꣡र्व꣢꣯म् । यत् । भू꣣त꣢म् । यत् । च꣣ । भा꣡व्य꣢꣯म् । पा꣡दः꣢꣯ । अ꣣स्य । स꣡र्वा꣢꣯ । भू꣣ता꣡नि꣢ । त्रि꣣पा꣢त् । त्रि꣣ । पा꣢त् । अ꣣स्य । अमृ꣡त꣢म् । अ꣣ । मृ꣡त꣢꣯म् । दि꣣वि꣢ ॥६१९॥

Mantra without Swara
पुरुष एवेदꣳ सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥

पुरुषः । एव । इदम् । सर्वम् । यत् । भूतम् । यत् । च । भाव्यम् । पादः । अस्य । सर्वा । भूतानि । त्रिपात् । त्रि । पात् । अस्य । अमृतम् । अ । मृतम् । दिवि ॥६१९॥

Samveda - Mantra Number : 619
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
उपादान कारण प्रकृति वा प्रधान सहित परमात्मा को यहां ‘पुरुष’ कहा है, क्योंकि वह पुर = ब्रह्माण्ड में शयन करता है। (इदम्) यह वर्तमान कल्पस्थ जगत् (यत्) और जो (भूतम्) भूत कल्पस्थ (च) और (यत् भाव्यम्) जो होने वाले कल्प में स्थित जगत् है (सर्वम्) यह सब (पुरुष) पुरुष (एव) निश्चय कहा जाता है। (अस्य) इन आपका (पादः) एक पादमात्र (विश्वा) सब (भूतानि) प्राणी हैं (अस्य) और इन आपके (त्रिपाद्) तीन पाद (अमृतम्) अमर (दिवि) अवकाश = रिक्त स्थान मात्र में है।
यद्यपि परमात्मा को “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इत्यादि उपनिषदों में अनन्त माना है, इसलिये वह “इतना है” इस परिमाण में नहीं आ सकता और परिमाणातीत पदार्थ में पादकल्पना नहीं बन सकती, परन्तु यह त्रिकालस्थ जगत् परमात्मा की अपेक्षा बहुत छोटा है। इस बात के वर्णन करने को पादकल्पना करके वर्णन कर दिया है॥
Footnote
ऋग्वेद १०। ९०। २ यजुर्वेद ३१। २ से पूर्वार्ध की तुल्यता और यजुर्वेद ३१। ३ से उत्तरार्ध की कुछ न्यून तुल्यता है॥