Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 618

1875 Mantra
Devata- पुरुषः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
त्रि꣣पा꣢दू꣣र्ध्व꣢꣫ उदै꣣त्पु꣡रु꣢षः꣣ पादो꣢ऽस्ये꣣हा꣡भ꣢व꣣त्पु꣡नः꣢ । त꣢था꣣ वि꣢ष्व꣣꣬ङ् व्य꣢꣯क्रामदशनानश꣣ने꣢ अ꣣भि꣢ ॥६१८॥

त्रि꣣पा꣢त् । त्रि꣣ । पा꣢त् । ऊ꣣र्ध्वः꣢ । उत् । ऐ꣣त् । पु꣡रु꣢꣯षः । पा꣡दः꣢꣯ । अ꣣स्य । इह꣢ । अ꣣भवत् । पु꣢न꣣रि꣡ति꣢ । त꣡था꣢꣯ । वि꣡ष्व꣢꣯ङ् । वि । स्व꣣ङ् । वि꣢ । अ꣣क्रामत् । अशनानशने꣢ । अ꣣शन । आनशने꣡इति꣢ । अ꣣भि꣢ ॥६१८॥

Mantra without Swara
त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः । तथा विष्वङ् व्यक्रामदशनानशने अभि ॥

त्रिपात् । त्रि । पात् । ऊर्ध्वः । उत् । ऐत् । पुरुषः । पादः । अस्य । इह । अभवत् । पुनरिति । तथा । विष्वङ् । वि । स्वङ् । वि । अक्रामत् । अशनानशने । अशन । आनशनेइति । अभि ॥६१८॥

Samveda - Mantra Number : 618
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
अग्ने ! परमात्मन् (अस्य) इन आपका (पादः) एक देशमात्र (इह) इस जगत् में (पुनः) बार-बार (अभवत्) होता है और (त्रिपात्) शेष आपका सच्चिदानन्दस्वरूप संसार के स्पर्श से रहित ही (पुरुषः) पूर्ण (ऊर्ध्वः) संसार से बाहर (उदैत्) उच्चभाव से रहता है (तथा) तथा जो जगत् में आया हुआ एक देश है वह (अशनाऽनशने) खाने आदि व्यवहारयुक्त चेतन प्राणिवर्ग और उससे रहित अचेतन पर्वत आदि पदार्थ, इन दोनों में (विष्वङ्) छिपा हुआ (अभिव्यक्रामत्) अभिव्याप्त होकर स्थित है।
अर्थात् जिस प्रकार परमात्मा अनन्त है, वैसे जगत् परमात्मा के बराबर अनन्त नहीं है, किन्तु परमात्मा के एक देश में सब जगत् बार-बार सृष्टिकाल में स्थित रहता है, शेष परमात्मा जगत् के बाहर बहुलता मे वर्त्तमान है, परमात्मा जितना जगत् में है, उतना ही सब चेतनाऽचेतन को अपनी एकदेशीय व्याप्ति में व्याप्त कर देता है॥
Footnote
ऋ० १०। ९०। ४ और यजुः ३१। ४ के पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥