Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 616

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
व꣣स꣡न्त इन्नु रन्त्यो꣢꣯ ग्री꣣ष्म꣡ इन्नु रन्त्यः꣢꣯ । व꣣र्षा꣡ण्यनु꣢꣯ श꣣र꣡दो꣢ हेम꣣न्तः꣡ शिशि꣢꣯र꣣ इन्नु꣡ रन्त्यः꣢꣯ ॥६१६

व꣣सन्तः꣢ । इत् । नु । र꣡न्त्यः꣢꣯ । ग्री꣣ष्मः꣢ । इत् । नु । र꣡न्त्यः꣢꣯ । व꣣र्षा꣡णि꣢ । अ꣡नु꣢꣯ । श꣣र꣡दः꣢ । हे꣣मन्तः꣢ । शि꣡शि꣢꣯रः । इत् । र꣡न्त्यः꣢꣯ ॥६१६॥

Mantra without Swara
वसन्त इन्नु रन्त्यो ग्रीष्म इन्नु रन्त्यः । वर्षाण्यनु शरदो हेमन्तः शिशिर इन्नु रन्त्यः ॥६१६

वसन्तः । इत् । नु । रन्त्यः । ग्रीष्मः । इत् । नु । रन्त्यः । वर्षाणि । अनु । शरदः । हेमन्तः । शिशिरः । इत् । रन्त्यः ॥६१६॥

Samveda - Mantra Number : 616
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे अग्ने ! परमेश्वर ! आपकी कृपा से (वसन्तः) चैत्र वैशाख २ मासों का ऋतु (रन्त्यः) रमणीय हो (इत्) और (नु) निश्चय (ग्रीष्मः) ज्येष्ठ आपाढ़ २ मासों का ऋतु (रन्त्यः) रमणीय हो (इत्) और (नु) निश्चय (वर्षाणि) श्रावण भाद्रपद का ऋतु (अनु) तत्पश्चात् (शरदः) आश्विन कार्तिक का ऋतु (हेमन्तः) मार्गशिर पौष का ऋतु (इत्) और (नु) निश्चय (शिशिरः) माघ फाल्गुन का ऋतु (रन्त्यः) रमणीय हो॥
Footnote
इसी प्रसंग का निरुक्त भी ४। २७ देखने योग्य है। उसका अर्थ यह है कि—“सप्त युञ्ज० ऋ०” एक चक्र अर्थात् एक प्रकार चलने वाले रथ को ७ जोड़ते हैं। चक्र शब्द चकति वा चरति वा क्रामति से बना है। एक अश्व ले चलता है जिसके ७ नाम हैं, वह सूर्य है। उसकी ७ किरणें (रश्मि) हैं। रश्मि इसलिये कहाती हैं कि उसको रस पहुँचाती हैं। इसी बात को यू भी कहा करते हैं कि इसकी ७ ऋषि स्तुति किया करते हैं। यह ऋषि नाम भी इसी कारण है कि किरण रस को पहुँचाती हैं। अगले आधे मन्त्र में संवत्सर का वर्णन है। संवत्सर नाम का चक्र है। ३ नाम ग्रीष्म वर्षा और हेमन्त हैं। इसको संवत्सर इससे कहते हैं कि इसमें सर्व भूतमात्र बसते हैं ग्रीष्म इससे कहाता है कि उसमें रस ग्रसे जाते हैं। वर्षा इसलिए कि उसमें मेघ वर्षता है। हेमन्त इससे कि उसमें हिम (पाला वा बर्फ) पड़ता है। हिम शब्द हन्ति वा हिनोति से बना है। संवत् को अजर इसलिये कहा कि यह पुराना नहीं पड़ता, सदा नवीन है। अनर्व इसलिये है कि और में नहीं और समाता। जिस सम्वत् में ये सब प्राणी जन्मते मरते रहते हैं, उसका वर्णन सब प्रकार से विभाग करके किया जाता है। जैसा कि ‘पञ्चारे चक्रे०’ इसमें ५ ऋतु करके वर्णन है। ‘संवत्सर’ की ५ ऋतु हैं, ऐसा ब्राह्मण में भी कहा है, हेमन्त और शिशिर को मिलाकर एक करने से ‘षडर आहुरर्पितम्' इस स्थान में षट् ऋतु करके वर्णन है। अराः इसलिये कहाते हैं कि अरे नाभि में पोये रहते हैं। और षट् शब्द सहति से बना है। ‘द्वादशारम्’ इत्यादि वाक्य में १२ मासों के विभाग से वर्णन है। मास इसलिये कहते हैं कि इनसे काल को मापते हैं। प्रधि चारों ओर घेरा कहाता है। तस्मिन्साकं ‘त्रिशता०’ इत्यादि में संवत्सर चक्र की ३६० कील गिनायी हैं। ब्राह्मण में भी लिखा है कि संवत्सर के दिन रात्रि मिलाकर ३६० हैं। ‘सप्न शतानि विंशतिश्च०’ इस स्थान में ७२० कहे हैं के भिन्न-भिन्न दिन और रात्रि को बांटकर ७२० कील जानो। यह भी ब्राह्मणवाक्य हैं॥