Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 613

1875 Mantra
Devata- आत्मा अग्निर्वा Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣡र꣢स्मि꣣ ज꣡न्म꣢ना जा꣣त꣡वे꣢दा घृ꣣तं꣢ मे꣣ च꣡क्षु꣢र꣣मृ꣡तं꣢ म आ꣣स꣢न् । त्रि꣣धा꣡तु꣢र꣣र्को꣡ रज꣢꣯सो वि꣣मा꣡नोऽज꣢꣯स्रं꣣ ज्यो꣡ति꣢र्ह꣣वि꣡र꣢स्मि꣣ स꣡र्व꣢म् ॥६१३॥

अ꣣ग्निः꣢ । अ꣣स्मि । ज꣡न्म꣢꣯ना । जा꣣त꣡वे꣢दाः । जा꣣त꣢ । वे꣣दाः । घृत꣢म् । मे꣣ । च꣡क्षुः꣢꣯ । अ꣣मृ꣡त꣢म् । अ꣣ । मृ꣡त꣢꣯म् । मे꣣ । आस꣢न् । त्रि꣣धा꣡तुः꣢ । त्रि꣣ । धा꣡तुः꣢꣯ । अ꣣र्कः꣢ । र꣡ज꣢꣯सः । वि꣣मा꣡नः꣢ । वि꣣ । मा꣡नः꣢꣯ । अ꣡ज꣢꣯स्रम् । अ । ज꣣स्रम् । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । ह꣣विः꣢ । अ꣣स्मि । स꣡र्व꣢꣯म् ॥६१३॥

Mantra without Swara
अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा घृतं मे चक्षुरमृतं म आसन् । त्रिधातुरर्को रजसो विमानोऽजस्रं ज्योतिर्हविरस्मि सर्वम् ॥

अग्निः । अस्मि । जन्मना । जातवेदाः । जात । वेदाः । घृतम् । मे । चक्षुः । अमृतम् । अ । मृतम् । मे । आसन् । त्रिधातुः । त्रि । धातुः । अर्कः । रजसः । विमानः । वि । मानः । अजस्रम् । अ । जस्रम् । ज्योतिः । हविः । अस्मि । सर्वम् ॥६१३॥

Samveda - Mantra Number : 613
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्निः अस्मि) मैं अग्नि हूँ। जो कि (जन्मना) जन्म से ही (जातवेदाः) ज्ञान के साधन प्रकाश का उत्पादक हूँ। (घृतम्) घृत (मे) मेरा (चक्षुः) प्रकाशक है (अमृतं मे आसन्) अमृत = प्रकाश मेरे मुख में है, (त्रिधातुः) तीन प्रकार अपने को धारण करने वाला हूँ १ — (अर्कः) प्राणरूप होकर (रजसः) अन्तरिक्ष का (विमानः) अधिष्ठाता हूँ। २ — (अजस्त्रं ज्योतिः) निरन्तर ज्योति=सूर्य होकर द्युलोक का अधिष्ठाता है। ३ — (सर्वम् हविः) सब हव्य (अस्मि) मैं हूँ॥
अर्थात् जब अग्नि प्रकट होता है तभी साथ ही प्रकाश भी प्रकट होता है। धी का सेचन मानो अग्नि की आंख में अञ्जन डालकर प्रकाश का बढ़ाना है। इसी से यह जतलाया है कि घृत का भोजन आंखों को गुणदायक है। अग्नि ही प्राणादि ३ रूपों से स्थित है। १. प्राण होकर अन्तरिक्ष, २. सूर्य होकर द्युलोक और ३. सब हव्य पदार्थों में व्याप कर पृथिवी का अधिष्ठाता है। जो प्रकाश के बढ़ाने वाले घृतादि हव्य पदार्थ हैं, वे सब आग्नेय हैं। तभी तो अग्नि के सहायक हैं। अग्नि जड़ पदार्थ में भी उत्तम पुरुष के साथ वर्णन करना वेद की विचित्र मनोहर शैली मात्र है॥
Footnote
ऋ० ३। २६। ७ का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥