Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 61

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
त्व꣡म꣢ग्ने गृ꣣ह꣡प꣢ति꣣स्त्व꣡ꣳ होता꣢꣯ नो अध्व꣣रे꣢ । त्वं꣡ पोता꣢꣯ विश्ववार꣣ प्र꣡चे꣢ता꣣ य꣢क्षि꣣ या꣡सि꣢ च꣣ वा꣡र्य꣢म् ॥६१॥

त्व꣢म् । अ꣣ग्ने । गृह꣡प꣢तिः । गृ꣣ह꣢ । प꣣तिः । त्व꣢म् । हो꣡ता꣢꣯ । नः꣢ । अध्वरे꣢ । त्वम् । पो꣡ता꣢꣯ । वि꣣श्ववार । विश्व । वार । प्र꣡चे꣢꣯ताः । प्र । चे꣣ताः । य꣡क्षि꣢꣯ । या꣡सि꣢꣯ । च꣣ । वा꣡र्य꣢꣯म् ॥६१॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने गृहपतिस्त्वꣳ होता नो अध्वरे । त्वं पोता विश्ववार प्रचेता यक्षि यासि च वार्यम् ॥

त्वम् । अग्ने । गृहपतिः । गृह । पतिः । त्वम् । होता । नः । अध्वरे । त्वम् । पोता । विश्ववार । विश्व । वार । प्रचेताः । प्र । चेताः । यक्षि । यासि । च । वार्यम् ॥६१॥

Samveda - Mantra Number : 61
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) प्रकाशस्वरूप ! (विश्वबार) सबको भक्ति करने योग्य ! परमात्मन् ! (त्वम्) आप (नः) हमारे (अध्वरे) ज्ञानयज्ञ में (गृहपतिः) यजमान हैं (त्वम्) आप ही (होता) होता हैं (त्वम्) आप ही (पोता) शुद्ध करने वाले हैं (प्रचेता) चेताने वाले भी आप ही हैं (यक्षि) यज्ञ भी आप ही करते हैं (च) और (वार्यं, यासि) कर्म फल भी आप ही पहुँचाते हैं॥
यद्यपि ज्ञानयज्ञ में जीवात्मा, यजमान और वाणी आदि होता पोता प्रचेता आदि ऋत्विज् हैं, परन्तु परमात्मा की कृपा बिना कुछ नहीं, इसलिये परमात्मा की मुख्यता दिखाने को यह कहा गया है कि आप ही सब कुछ हैं।
भौतिक पक्ष में—(अग्ने) अग्ने ! (विश्ववार) सबको स्वीकार करने योग्य ! (त्वम्) तू ही (नः) हमारे (अध्वरे) कर्मयज्ञ में (गृहपतिः) घर धणी यजमान है और (त्वं, होता) तू ही, होता (त्वं, पोता) तू ही शोचने वाला (प्रचेताः) चेताने वाला है। (यक्षि) तू ही यज्ञ करता है (च) और (वार्यं, यासि) हव्य, पहुँचाता है।
यद्यपि कर्मयज्ञ में भिन्न-भिन्न यजमान होता पोता प्रचेता आदि ऋत्विज् होते हैं, परन्तु मुख्य अग्नि है इसलिये उसकी मुख्यता दिखाने को यह कहा है कि अग्नि ही सब कुछ है॥
Footnote
ऋग्वेद ७।१६।५ में “यक्षि वेषि च” ऐसा पाठ है॥