Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 607

1875 Mantra
Devata- अपांनपात् Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
स꣢म꣣न्या꣡ यन्त्युप꣢꣯यन्त्य꣣न्याः꣡ स꣢मा꣣न꣢मू꣣र्वं꣢ न꣣꣬द्य꣢꣯स्पृणन्ति । त꣢मू꣣ शु꣢चि꣣ꣳ शु꣡च꣢यो दीदि꣣वा꣡ꣳस꣢म꣣पा꣡न्नपा꣢꣯त꣣मु꣡प꣢ य꣣न्त्या꣡पः꣢ ॥६०७॥

स꣢म् । अ꣣न्याः꣢ । अ꣣न् । याः꣢ । य꣡न्ति꣢꣯ । उ꣡प꣢꣯ । य꣣न्ति । अन्याः꣢ । अ꣣न् । याः꣢ । स꣣मान꣢म् । स꣣म् । आन꣢म् । ऊ꣣र्व꣢म् । न꣣द्यः꣢꣯ । पृ꣣णन्ति । त꣢म् । उ꣣ । शु꣡चि꣢꣯म् । शु꣡चयः꣢꣯ । दी꣣दिवाँ꣡स꣢म् । अ꣣पा꣢म् । न꣡पा꣢꣯तम् । उ꣡प꣢꣯ । य꣣न्ति । आ꣡पः꣢꣯ ॥६०७॥

Mantra without Swara
समन्या यन्त्युपयन्त्यन्याः समानमूर्वं नद्यस्पृणन्ति । तमू शुचिꣳ शुचयो दीदिवाꣳसमपान्नपातमुप यन्त्यापः ॥

सम् । अन्याः । अन् । याः । यन्ति । उप । यन्ति । अन्याः । अन् । याः । समानम् । सम् । आनम् । ऊर्वम् । नद्यः । पृणन्ति । तम् । उ । शुचिम् । शुचयः । दीदिवाँसम् । अपाम् । नपातम् । उप । यन्ति । आपः ॥६०७॥

Samveda - Mantra Number : 607
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
अग्ने ! परमेश्वर ! जिस प्रकार (अन्याः आपः) कोई जल तो (ऊर्वम्) समुद्र में स्थित बड़वानल में (सं यन्ति) मिल जाते हैं (अन्याः) और दूसरे जल (उपयन्ति) समीप तक पहुँचने पाते हैं। और कोई (नद्यः) नदी बनकर (समानम्) एक साथ (पृणन्ति) अपने को देते हैं (उ) ऐसे ही (तम्) उन (दीदिवांसम्) अत्यन्त प्रकाशमान (अपां न पातम्) कर्मों के न गिराने वाले को (शुचयः) पवित्र पूर्वोक्त वाणियें (उपयन्ति) समीप प्राप्त होती हैं, उनमें कोई साक्षात् और कोई परम्परा से आपका वर्णन करती हैं॥
Footnote
यद्वा, एक प्रकार के जल जो यज्ञ में “एक धन” बहाते हैं और दूसरे जो “वसतीवरी” संज्ञक होते हैं ये सब चात्वाल और उत्कर नामक स्थानों में मिलकर, मेघमण्डल द्वारा वर्ष कर, नदी बनकर, समुद्र को प्राप्त होते हैं। अन्य सब पूर्व के तुल्य है। वेददीप (यजुर्भाष्य) ५। ७ में लिखा है कि जिन घड़ों से सोमकण्डनाथ जल लाया जाता है, वे “एकधन” कहाते हैं। इसी से उनके जल को भी एकधन कह सकते हैं। तथा वहीं लिखा है कि उत्तरवेदि के निचयार्थ जिस भुमि भाग में मिट्टी खोदते हैं वह स्थान “चात्वल” कहाता है और “उत्कर” भी यज्ञ के स्थानविशेष का नाम है। वेददीप १। २५ में लिखा है कि “स्पव” नाम यज्ञपात्रविशेष से उखाड़ी हुई मिट्टी को “उत्कर” नामक स्थान में डाले।
निघण्टु ३। २० का प्रमाण और ऋ० २। ३५। ३ का पाठान्तर संस्कृतभाष्य में देखिये॥