Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 605

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣡मी꣢डे पु꣣रो꣡हि꣢तं य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ दे꣣व꣢मृ꣣त्वि꣡ज꣢म् । हो꣡ता꣢रꣳ र꣣त्नधा꣡त꣢मम् ॥६०५॥

अ꣣ग्नि꣢म् । ई꣣डे । पुरो꣡हि꣢तम् । पु꣣रः꣢ । हि꣣तम् । यज्ञ꣡स्य꣢ । दे꣣व꣢म् । ऋ꣣त्वि꣡ज꣢म् । हो꣡ता꣢꣯रम् । रत्नधा꣡त꣢मम् । र꣣त्न । धा꣡त꣢꣯मम् ॥६०५॥

Mantra without Swara
अग्निमीडे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारꣳ रत्नधातमम् ॥

अग्निम् । ईडे । पुरोहितम् । पुरः । हितम् । यज्ञस्य । देवम् । ऋत्विजम् । होतारम् । रत्नधातमम् । रत्न । धातमम् ॥६०५॥

Samveda - Mantra Number : 605
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे परमेश्वर ! (अग्निम्) प्रकाशस्वरूप (पुरोहितम्) सर्वव्यापक होने से सब के आगे वर्तमान (यज्ञस्य) यज्ञ के (देवम्) प्रकाशक (ऋत्विजम्) ऋतु में पूजनीय (होतारम्) सब के दाता और आदाता (रत्नधातमम्) सम्पूर्ण रम्य पदार्थों को बहुतायत से धारण करने वाले [आपकी] (ईडे) स्तुति करता हूँ॥
अथवा ज्ञानयज्ञ के आप ही अग्नि, आप ही पुरोहित, आप ही ऋत्विज्, आप ही होता हैं। अकेले ही आप सर्व कार्य साधते हैं॥
Footnote
निरुक्त ७। १५ और २। १२ फिट् सूत्र १ उणादि ४। ५० अष्टाध्यायी ३। १। ३॥ ६। १। १०७। ८। २। ५॥ ८। १। २८॥ ८। ४। ६६॥ १। २। ३९॥ ५। ३। ३९॥ ७। ४। ४२॥ १। ४। ६७॥ २। २। १८॥ ६। २। २॥ ६। २। १३९॥ ६। २। ४९॥ १। २। ४० इत्यादि प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० १। १। १ में भी॥