Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 60

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- उत्कीलः कात्यः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣य꣢म꣣ग्निः꣢ सु꣣वी꣢र्य꣣स्ये꣢शे꣣ हि꣡ सौभ꣢꣯गस्य । रा꣡य꣣ ई꣢शे स्वप꣣त्य꣢स्य꣣ गो꣡म꣢त꣣ ई꣡शे꣢ वृत्र꣣ह꣡था꣢नाम् ॥६०॥

अ꣣य꣢म् । अ꣣ग्निः꣢ । सु꣣वी꣡र्य꣣स्य । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯स्य । ई꣡शे꣢꣯ । हि । सौ꣡भ꣢꣯गस्य । सौ । भ꣣गस्य । रायः꣢ । ई꣣शे । स्वपत्य꣡स्य꣣ । सु꣣ । अपत्य꣡स्य꣢ । गो꣡म꣢꣯तः । ई꣡शे꣢꣯ । वृ꣣त्रह꣡था꣢नाम् । वृ꣣त्र । ह꣡था꣢꣯नाम् ॥६०॥

Mantra without Swara
अयमग्निः सुवीर्यस्येशे हि सौभगस्य । राय ईशे स्वपत्यस्य गोमत ईशे वृत्रहथानाम् ॥

अयम् । अग्निः । सुवीर्यस्य । सु । वीर्यस्य । ईशे । हि । सौभगस्य । सौ । भगस्य । रायः । ईशे । स्वपत्यस्य । सु । अपत्यस्य । गोमतः । ईशे । वृत्रहथानाम् । वृत्र । हथानाम् ॥६०॥

Samveda - Mantra Number : 60
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अयम्) यह (अग्निः) परमात्मा वा भौतिक (सुवीर्यस्य सौभगस्य, हि) सुन्दर वीर्य और सौभाग्य का (ईशे) स्वामी है। (रायः) धन का (स्वपत्यस्य) सुन्दर सन्तान का (गोमतः) और गवादि पशुयुक्त होने का (ईशे) अधिकारी है। तथा (वृत्रहथानाम्) वृत्र जो रोगादि शत्रु असुर उनके नाशों का (ईशे) अधिष्ठाता है।
Footnote
परमात्मा की भक्ति और भौतिक अग्नि में हवन करने वा उससे अनेकविध शिल्पप्रयोगादि द्वारा मनुष्यों को बल वीर्य पुरुषार्थ सौभाग्य धन सुसन्तान और गवादि पशु प्राप्त होते हैं और सर्व दुष्ट रोगादि असुर शत्रुगण का नाश होता है। क्योंकि परमात्मा वा भौतिकाग्नि इन सबका ईशिता है। उणादि २। २ सूत्र संस्कृतभाष्य में देखिये॥ जिससे ‘वृत्रहथानाम्’ पद सिद्ध होता है। परन्तु इस पद की सिद्धि में सत्यव्रत सामश्रमी जी की छपाई कलकत्ते की सायणभाष्यसहित सामवेद संहिता की टिप्पणी में भूल से (देखो संस्कृतभाष्य पृ० १२८ पं० २१—२२) दो सूत्र इस पद की सिद्धि में छपे हैं, जिनसे यह पद सिद्ध नहीं हो सकता। इसकी देखादेखी अटकलपच्चू पं० ज्वालाप्रसाद भार्गव ने भी वही दोनों सूत्र अपने भाष्य में टीप दिये। यह नहीं विचारा कि धन आदेश से और इससे क्या सम्बन्ध ! और यह भी नहीं सोचा कि अष्टाध्यायी के सप्तमाध्याय प्रथम पाद में १५५ समस्त सूत्र भी नहीं किन्तु १०३ है फिर “सप्तनप्तनथनाश्च” की संख्या १५५ कैसे हो सकती है किन्तु ४५ है। कलकत्ते की छपी ऊपर लिखी ऐसियाटिकसुसाइटी की पुस्तक से ज्यों का त्यों अशुद्ध १५५ का अंक उद्धृत करदिया, न सूत्रसंख्या देखी, न उन सूत्रों के विषय को विचारा, शोक !॥