Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 6

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सुदीतिपुरुमीढावाङ्गिरसौ तयोर्वान्यतरः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
त्वं꣡ नो꣢ अग्ने꣣ म꣡हो꣢भिः पा꣣हि꣡ विश्व꣢꣯स्या꣣ अ꣡रा꣢तेः । उ꣣त꣢ द्वि꣣षो꣡ मर्त्य꣢꣯स्य ॥६॥

त्व꣢म् । नः꣢ । अग्ने । म꣡हो꣢꣯भिः । पा꣣हि꣢ । वि꣡श्व꣢꣯स्य । अ꣡रा꣢꣯तेः । अ । रा꣣तेः । उत꣢ । द्वि꣣षः꣢ । म꣡र्त्य꣢꣯स्य ॥६॥

Mantra without Swara
त्वं नो अग्ने महोभिः पाहि विश्वस्या अरातेः । उत द्विषो मर्त्यस्य ॥

त्वम् । नः । अग्ने । महोभिः । पाहि । विश्वस्य । अरातेः । अ । रातेः । उत । द्विषः । मर्त्यस्य ॥६॥

Samveda - Mantra Number : 6
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने, त्वम्) अग्ने ! तुम (महोभिः ) हवनादि से ( विश्वस्याः ) सब (अरातेः) दुःखदायक (उत) और ( मर्त्यस्य, द्विषः) मनुष्य के शत्रु से (नः) हम को ( पाहि) बचाओ ॥
अर्थात् जब मनुष्य होमादि से अग्नि का उपयोग लें और अग्नि को अपने अनुकूल करें तब वह अग्नि वायु आदि की शुद्धि द्वारा मनुष्य के शत्रु दुःखदायक जो रोग शोक दुःखादि हैं उन सब से बचाता है । इस लिये मनुष्यों को अग्नि द्वारा यज्ञ करना चाहिये जिस से मनुष्य के हानिकारक जो वाय्वादिगत दोष हैं और उस में उत्पन्न हुए जो सूक्ष्म संक्रामक कीड़े आदि हैं उनका नाश हो और मनुष्य सुखी हों । प्र०–अग्नि जड़ है वह प्रसन्न वा अनुकूल कैसे हो सकता है ? उ०–जब जिस पदार्थ के गुण भले प्रकार सेवन किये जाते हैं तब वह चेतन वा अचेतन कोई हो, अनुकूल हो जाता है । पित्तकोप वा कफप्रसाद के समान जड़ में भी कोप और शान्ति का व्यवहार होता है । इसलिये प्रश्न को अवकाश नहीं ॥
ईश्वर पक्ष में—भी यही अर्थ है कि मनुष्यों को परमात्मा की पूजा अर्थात् स्तुति प्रार्थना उपासनादि करनी चाहिये जिससे सब प्रकार के मनुष्य के दुःख और दुःखदायक शत्रु निवृत्त हों ॥
Footnote
ऋग्वेद ८ । ६०।१ में भी ऐसी ही ऋचा है॥