Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 597

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
इ꣢न्द्र꣣ इ꣢꣫द्धर्योः꣣ स꣢चा꣣ स꣡म्मि꣢श्ल꣣ आ꣡ व꣢चो꣣यु꣡जा꣢ । इ꣡न्द्रो꣢ व꣣ज्री꣡ हि꣢र꣣ण्य꣡यः꣢ ॥५९७॥

इ꣡न्द्रः꣢꣯ । इत् । ह꣡र्योः꣢꣯ । स꣡चा꣢꣯ । स꣡म्मि꣢꣯श्लः । सम् । मि꣣श्लः । आ꣢ । व꣣चोयु꣡जा꣢ । व꣣चः । यु꣡जा꣢꣯ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । व꣣ज्री꣢ । हि꣣रण्य꣡यः꣢ ॥५९७॥

Mantra without Swara
इन्द्र इद्धर्योः सचा सम्मिश्ल आ वचोयुजा । इन्द्रो वज्री हिरण्ययः ॥

इन्द्रः । इत् । हर्योः । सचा । सम्मिश्लः । सम् । मिश्लः । आ । वचोयुजा । वचः । युजा । इन्द्रः । वज्री । हिरण्ययः ॥५९७॥

Samveda - Mantra Number : 597
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
इस पूर्वोक्त सूर्य, चन्द्र, मेध, बिजुली आदि का नियन्ता कौन है ? इसके उत्तर में कहते हैं कि—(इन्द्रः) परमेश्वर (इत्) ही (वचोयुजा) वचनवद्ध (हर्योः) सूर्य चन्द्रमाओं के (सचा) साथ व्यापक होने से (आ संमिश्लः) सर्वत्र मिला हुआ है (इन्द्रः) वही परमेश्वर (वज्री) दण्ड देने वाला और (हिरण्ययः) ज्योतिःस्वरूप है। इसी से यह जगत् नियमित है॥
Footnote
शतपथ ६। ७। १। २ का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋग्वेद १। ७। २ में भी॥