Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 594

1875 Mantra
Devata- अन्नम् Rishi- आत्मा Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
अ꣣ह꣡म꣢स्मि प्रथम꣣जा꣡ ऋ꣣त꣢स्य꣣ पू꣡र्वं꣢ दे꣣वे꣡भ्यो꣢ अ꣣मृ꣡त꣢स्य꣣ ना꣡म꣢ । यो꣢ मा꣣ द꣡दा꣢ति꣣ स꣢꣫ इदे꣣व꣡मा꣢वद꣣ह꣢꣫मन्न꣣म꣡न्न꣢म꣣द꣡न्त꣢मद्मि ॥५९४

अ꣣ह꣢म् । अ꣣स्मि । प्रथमजाः꣢ । प्र꣣थम । जाः꣢ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । पू꣡र्व꣢꣯म् । दे꣣वे꣡भ्यः꣢ । अ꣣मृ꣡त꣢स्य । अ꣣ । मृ꣡त꣢꣯स्य । ना꣡म꣢꣯ । यः । मा꣣ । द꣡दा꣢꣯ति । सः । इत् । ए꣣व꣢ । मा꣣ । अवत् । अह꣢म् । अ꣡न्न꣢꣯म् । अ꣡न्न꣢꣯म् । अ꣣द꣡न्त꣢म् । अ꣣द्मि ॥५९४॥

Mantra without Swara
अहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य पूर्वं देवेभ्यो अमृतस्य नाम । यो मा ददाति स इदेवमावदहमन्नमन्नमदन्तमद्मि ॥५९४

अहम् । अस्मि । प्रथमजाः । प्रथम । जाः । ऋतस्य । पूर्वम् । देवेभ्यः । अमृतस्य । अ । मृतस्य । नाम । यः । मा । ददाति । सः । इत् । एव । मा । अवत् । अहम् । अन्नम् । अन्नम् । अदन्तम् । अद्मि ॥५९४॥

Samveda - Mantra Number : 594
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
परमात्मा वा अन्न कहता है कि—हे मनुष्यों ! (अहम्) मैं (देवेभ्यः) वायु विद्युत् आदि देवतों से (प्रथमजाः) पूर्वज (अस्मि) हूँ और (ऋतस्य) सच्चे (अमृतस्य) अमृत का (नाम) टपकाने वाला हूं। (यः) जो पुरुष (मा ददाति) मेरा दान करता है (सः इत्) वही (एवम्) ऐसे (आवत्) प्राणियों की रक्षा करता है। [और जो किसी को न दे कर आप ही खाता है] उस (अन्नम् अदन्तम्) अन्न खाते हुए को (अहम् अन्नम्) मैं अन्न (अद्मि) खा जाता हूँ—नष्ट कर देता हूँ॥
अर्थात् परमात्मा कहता है कि मैं सबका प्राणाधार जीवनाधार होने से अन्न हूँ। जो लोग स्वयं मुझको जानकर अन्यों के लिऐ मेरा दान करते हैं अर्थात् ब्रह्मज्ञानोपदेश करते हैं, वे प्राणियों की रक्षा करते और पुण्य भागी होते हैं, परन्तु अन्यों को उपदेश न करने वाले ज्ञानित्वाऽभिमानियों को मैं नष्ट कर देता हूँ॥
दूसरे पक्ष में कल्पना की रीति पर अन्न कहता है कि प्रत्येक देवता से पूर्व मैं हूँ। कोई वस्तु अपने भक्ष्य (मुझ) बिना नहीं रह सकती। इसलिए जो लोग मेरा दान (अन्नदान) करते हैं वे प्राणियों की रक्षा करते हैं और जो असुर केवल अपना ही पेट पालते हैं, अन्य अतिथि आदि को अन्नदान नहीं करते, उन उदरम्भरियों को मैं अन्न नष्ट कर देता हूँ॥
Footnote
इस ऋचा के सम्बन्ध में निरुक्त परिशिष्ट १४। १-१० तक देखना चाहिये, जो विस्तार के भय से हमने उद्धृत नहीं किया॥