Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 592

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अमहीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
स꣢ न꣣ इ꣡न्द्रा꣢य꣣ य꣡ज्य꣢वे꣣ व꣡रु꣢णाय म꣣रु꣡द्भ्यः꣢ । व꣣रिवोवि꣡त्परि꣢꣯स्रव ॥५९२॥

सः꣢ । नः꣣ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । य꣡ज्य꣢꣯वे । व꣡रु꣢꣯णाय । म꣣रु꣡द्भ्यः꣢ । व꣣रिवोवि꣢त् । व꣣रिवः । वि꣢त् । प꣡रि꣢꣯स्र꣣व ॥५९२॥

Mantra without Swara
स न इन्द्राय यज्यवे वरुणाय मरुद्भ्यः । वरिवोवित्परिस्रव ॥

सः । नः । इन्द्राय । यज्यवे । वरुणाय । मरुद्भ्यः । वरिवोवित् । वरिवः । वित् । परिस्रव ॥५९२॥

Samveda - Mantra Number : 592
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सः) वह पवित्र परमात्मा (नः) हमारे (वरिवोवित्) धान्यादि धन के दिलाने वाले आप (यज्यवे) यजन करने वाले (इन्द्राय) विद्युत् (वरुणाय) अपान और (मरुद्भयः) वायुओं के लिये (परिस्रव) वृष्टि करने की योग्यता दें॥
Footnote
“परमात्मा प्राणों का भी प्राण है” इत्यादि उपनिषदों के प्रमाणों से सिद्ध है कि परमात्मा प्राण अपानादि को अपने-अपने काम में प्रवृत्त करने वाला है॥ वरुण पद से यहाँ मेधस्थ जल को नीचे खसकाने वाले अपान नामक वायु विशेष के ग्रहण में ऋग्वेद ४। ४। ३०। ३ और निरुक्त १०। ४ के प्रमाण संस्कृतभाष्य 'में देखिये।
ऋ० ९। ६१। १२ में भी॥