Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 586

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
इ꣢न्द्र꣣ ज्ये꣡ष्ठं꣢ न꣣ आ꣡ भ꣢र꣣ ओ꣡जि꣢ष्ठं꣣ पु꣡पु꣢रि꣣ श्र꣡वः꣢ । य꣡द्दिधृ꣢꣯क्षेम वज्रहस्त꣣ रो꣡द꣢सी꣣ उ꣢꣯भे सु꣢꣯शिप्र पप्राः ॥५८६॥

इ꣡न्द्र꣢꣯ । ज्ये꣡ष्ठ꣢म् । नः꣣ । आ꣢ । भ꣣र । ओ꣡जि꣢꣯ष्ठम् । पु꣡पु꣢꣯रि । श्र꣡वः꣢꣯ । यत् । दि꣡धृ꣢꣯क्षेम । व꣣ज्रहस्त । वज्र । हस्त । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । उ꣣भे꣡इति꣢ । सु꣣शिप्र । सु । शिप्र । पप्राः ॥५८६॥

Mantra without Swara
इन्द्र ज्येष्ठं न आ भर ओजिष्ठं पुपुरि श्रवः । यद्दिधृक्षेम वज्रहस्त रोदसी उभे सुशिप्र पप्राः ॥

इन्द्र । ज्येष्ठम् । नः । आ । भर । ओजिष्ठम् । पुपुरि । श्रवः । यत् । दिधृक्षेम । वज्रहस्त । वज्र । हस्त । रोदसीइति । उभेइति । सुशिप्र । सु । शिप्र । पप्राः ॥५८६॥

Samveda - Mantra Number : 586
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वज्रहस्त) आयुध वा शस्त्र हाथ में रखने वाले ! वा कड़क को धारित करने वाले ! (सुशिप्र) सुन्दर नासिका युक्त ! (इन्द्र) राजन् वा विद्युत् ! (यत्) जिससे (उभे) दोनों (रोदसी) द्युलोक और भूमि को (पप्राः) पूरित करता है [वही] (ज्येष्ठम्) बहुत (ओजिष्ठम्) बलिष्ठ (पुपुरि) तृप्तिकारक (श्रवः) अन्न (नः) हमारे लिये (आभर) प्राप्त कराइये। तथा जो हम (दिधृक्षेम) धारण करना चाहें वह भी॥
Footnote
इन्द्र शब्द से यहां राजा और पक्षान्तर में विद्युत् का ग्रहण है। राजा को तो स्पष्ट ही वज्रधारी और सुन्दर नासिकादि अङ्गों से युक्त तथा अन्नवर्धक कहना ठीक है। विद्यतु के पक्ष में यह रूपकालङ्कार है। विद्युत् का प्रहार वज्रतुल्य है और चमक नासिक की उपमा देने में युक्त है॥
यहाँ कोई-कोई लोग वज्रहस्तादि विशेषण देखकर और निरुक्त में देवतों के पुरुषाकार होने के वर्णन को देखकर शंका में पड़ते हैं कि कहीं यह स्वर्गस्थ पुरुषाकार माने हुए इन्द्र का वर्णन तो नहीं है ? उनके भ्रम निवारणार्थ उस प्रकरण को सब निरुक्त उदाहरणों और अर्थों सहित नीचे लिखा जाता है:—
“अथाकारचिन्तनं देवतानाम्। पुरुषविधाः स्युरित्येकं चेतनावद्धि स्तुतयो भवन्ति तथाभिधानानि। अथापि पौरुपविधिरङ्गः संस्तूयन्ते॥”
ऋष्वा त इन्द्र स्थविरस्य बाहू॥
अर्थात् अव देवताओं के आकार का विचार करते हैं। एक आकार देवतों का मनुष्याकार है क्योंकि चेतन के समान स्तुतियां हैं और नाम भी। और मनुष्यों के अङ्गों का वर्णन भी पाया जाता है (जैसा कि—)
उरुं नौ लोकपनु नेषि विद्वान् ज्ज्योतिरभयं स्वस्ति।
ऋश्वा त इन्द्र स्यविरस्य बाहू उपस्येपाम शरणा बृहन्तां॥ (ऋ० ६। ४७। ८॥)
अर्थ: — (इन्द्र) हे राजन् ! (स्थविरस्य) जिस विद्याविनयबुद्ध (ते) आपके (शरणा) शत्रुनाशक (बृहन्ता) बड़ी (ऋष्वा) श्रेष्ठ (बाहू) भुजाओं को हम (उपस्थेयाम) उपस्थित होवें (विद्वान्) वह आप विद्वान् जिस से (नः) हमको (उरुम्) बहुत (स्वर्वत्) सुखयुक्त (ज्योतिः) प्रकाश और (अभयम्) भयरहित (स्वस्ति) सुख और (लोकम्) दर्शन को (अनु नेषि) प्राप्त कराते हो॥
इसमें राजा को मनुष्याकार देवता मानकर प्रशंसा (स्तुति) की है। दूसरा उदाहरण निरुक्तकार ने देवता के मनुष्याकार होने का यह दिया है कि—
यः संगृभ्णा मघवन्काशिरिते
इसका अर्थ यह है कि हे (मघवन्) धनवन् ! राजन् ! (यत्) जो कि (ते) आपकी (काशिः) मुट्ठी है वह (संगृभ्णा) संग्रह करने वाली हो॥
काशिर्मुष्टिः निरुक्त ६। १ फिर निरुक्तकार कहने हैं—
अथापि पौरुषविधिकैर्द्रव्यसंयोगैः। आ द्वाभ्यां
हरियामिन्द्र याहि। कल्याणीर्जा सुरणं गृहे ते।
अर्थात् मनुष्यों के से द्रव्यों का भी वर्णन देवतों में पाया जाता है। जैसा कि नीचे के मन्त्र में है—
आ द्वाभ्यां हरिभ्यामिन्द्र याह्य चतुर्भिरा षद्भिर्ह्रयमानः।
अष्टा मद॒शभि सोपेर्य सुता सुख मा मृर्षका॥ ऋ०२। १८।४॥
अर्थ:— (इन्द्र) परमैश्वरर्ययुक्त राजन् (हूयमानः) बुलाये हुए आप (द्वाभ्यां हरिभ्याम्) दो हरणशील पदार्थों से युक्त यान द्वारा (आ याहि) आइये (चतुर्भिः) चार से (आ) आइपे (षड्भिः) छः से (आ) आइये (अष्टाभिः) आठ से (आ) आइये (दशभिः) दश हरणशील पदार्थों से युक्त यान के द्वारा आइये (अयम्) इस (सुतः) उत्पन्न किये रस के (सोमपेयम्) सोमपानार्थ आइये (सुमख) हे सुन्दर यज्ञ वाले ! (मृधः) संग्रामों को (मा कः) न कीजिये।
अर्थात् राजा को योग्य है कि अग्नि आदि पदार्थों से सम्पादित यन्त्र आदि निर्मित यानों द्वारा जावे आवे। सज्जनों से सोमपाकादि आदर सत्कार ग्रहण कर ले, संग्राम न करे॥ फिर निरुक्त ने दूसरा प्रतीक नीचे लिखे मन्त्र का दिया है:—
अपाः सोम॒वस्त॑मिन्द्र प्रया॑हि कल्याणीर्जाया तुरणं गृहे ते।
यत्रा रर्थस्य बृहतो निधानं विमोचनं वाजिनो दक्षिणावत्। ऋ० ३। ५३। ६॥
अर्थः— (इन्द्र) हे राजन् ! (यत्र) जिस गृह में (बृहतः) बड़े (रथस्य) विमान रथ और (वाजिनः) अग्नि जन्य घोड़े का (निधानम्) स्थापन और (विमोचनम्) खोलने का (दक्षिणावत्) दक्षिणा के तुल्य है (गृहे) जिस आपके गृह में (कल्वाणीः) सुखदायिका (जाया) स्त्री है उस (अस्तम्) गृह को [निघण्टु ३। ४] (प्र याहि) आइये जाइये और (सोमम्) सोमरस को (अपाः) पीजिये, जिससे (सुरणम्) अच्छे प्रकार संग्राम हो। तथा निरुक्त—
अथापि पौरुषविधिकै। कर्षभिः। चन्द् पिब च प्रस्थिवस्थ। था कर्ण श्रधी एवं॥
अर्थात् निरुक्तकार कहते हैं कि मनुष्यों के से काम भी देवतों के वेद में पाये जाते हैं। जैसा कि—(इन्द्र) हे राजन् ! (अद्धि) भोजन कीजिये (पिब च) और पान कीजिये। इत्यादि। और (श्रुत्कर्ण) सुनने की शक्ति रूप कान वाले ! (हवम्) पुकार को (आ श्रुधी) सब और से श्रवण कीजिये।
यहां तक निरुक्तकार ने यह बताया है कि मनुष्यों के से कर्म, मनुष्यों के से वाहनादि और मनुष्यों के से अङ्ग देवतों के वेद में वर्णन किये प्रतीत होते हैं। इससे मनुष्य भी दान, दीपन, द्योतनादि गुणों से इन्द्रादिपदवाच्य देवता हैं। इससे आगे निरुक्तकार यह बतलाते हैं कि वायु, सूर्य, अग्नि आदि पदार्थ जो मनुष्याकार नहीं है, वह भी देवता हैं। यथा—
अपुरुषविधाः स्युरित्यपरमपि तु यद्दश्यतेऽपुरुषविधं तद्यथाऽग्निर्वायुरादित्यः पृथिवी चन्द्रमा इति। यथो एतच्चेतनावद्धिस्तुतयो भवन्तीत्यचेतनान्यप्येवं स्तूयन्ते। यथा ऽक्षप्रभृतीन्योषधिपर्यन्तानि। यथो एतत्पौरुपविधिकैरङ्ग: संस्तूयन्त इत्यचेतनेष्वप्येतद्भवति। अभिकृन्दन्ति हरितेभिरासभिः इतिग्रावस्तुतिः। यथो एतत्पौरुषविधिकैद्रव्यमंयोगैरित्येतदपि तादृशमेव। सुखं रथं युयुजे सिन्धुरश्विनमिति नदीस्तुतिः। यथो एतत्पौरुषविधिकैः कर्मभिरित्येतदपि तादृशमेव। होतुश्चिन्पूर्व हविरद्यमाशतेतिं ग्रावस्तुतिरेव। अपि वोभयविधाः स्युरपिं वा पुरुपविधानामेव सतां कर्मात्मान एते स्युर्यथा यज्ञो यजमानस्यैप चाख्यानसमयः। निरुक्ते ७। ७॥
अर्थात् निरुक्तकार कहते हैं कि बहुत से देवता मनुष्याकार नहीं भी है। जैसे देखा जाता है कि अग्नि, वायु, सूर्य, पृथिवी, चन्द्रमा ये देवता है। जिस प्रकार चेतनों की प्रशंसा पाई जाती है वैसी जड़ (अचेतन) देवतों की भी पाई जाती है। जैसे कि अक्ष से लेकर ओषधि पर्यन्त हैं। और जिस प्रकार मनुष्याकार अंगों से स्तुति पाई जाती हैं,ऐसी अचेतन जड़ पदार्थों की भी प्रशंसा पाई जाती हैं। “पत्थरों के हरे मुख” (हरे मसाले पीसने से) कहे गये हैं। और जिस प्रकार चेतनों के वाहनादि द्रव्यों का वर्णन है इसी प्रकार जड़ पदार्थों के भी वाहनादि का वर्णन देखा जाता है, जैसा कि “नदी ने सुखदायक रथ जोड़ा” (प्रवाह से अभिप्राय है)। और जिस प्रकार मनुष्याकार देवतों के कर्म पाये जाते हैं इसी प्रकार अचेतनों के भी। जैसा कि “होता से पहले सिल बट्टों ने मसाला चाट लिया” यह देखा जाता है। इससे या तो देवता दोनों प्रकार के हों, अथवा मनुष्याकारों के ही कर्म रूप देवता निराकार हो, जैसे यजमान मनुष्याकार देवता और उसका कर्म “यज्ञ” निराकार देवता है। और यह आख्यान का समय है॥
ऋ० ९। ४६। ५ का पाठान्तर संस्कृतभाष्य में देखिये।