Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 585

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ऋजिश्वा भारद्वाजः Chhand- ककुप् Swara- मध्यमः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
य꣢ उ꣣स्रि꣢या꣣ अ꣢पि꣣ या꣢ अ꣣न्त꣡रश्म꣢꣯नि꣣ नि꣡र्गा अकृ꣢꣯न्त꣣दो꣡ज꣢सा । अ꣣भि꣢ व्र꣣जं꣡ त꣢त्निषे꣣ ग꣢व्य꣣म꣡श्व्यं꣢ व꣣र्मी꣡व꣢ धृष्ण꣣वा꣡ रु꣢ज । ओ꣡३म् व꣣र्मी꣡व꣢ धृष्ण꣣वा꣡ रु꣢ज ॥५८५॥

यः꣢ । उ꣣स्रि꣡याः꣢ । उ꣣ । स्रि꣡याः꣢꣯ । अ꣡पि꣢꣯ । याः । अ꣣न्तः꣢ । अ꣡श्म꣢꣯नि । निः । गाः । अ꣡कृ꣢꣯न्तत् । ओ꣡ज꣢꣯सा । अ꣢भि꣣ । व्र꣣ज꣢म् । त꣣त्निषे । ग꣡व्य꣢꣯म् । अ꣡श्व्य꣢꣯म् । व꣣र्मी꣢ । इ꣣व । धृष्णो । आ꣢ । रु꣣ज । ओ꣢३म् । व꣣र्मी꣡व꣢धृष्ण꣣वा꣡रु꣢ज ॥५८५॥

Mantra without Swara
य उस्रिया अपि या अन्तरश्मनि निर्गा अकृन्तदोजसा । अभि व्रजं तत्निषे गव्यमश्व्यं वर्मीव धृष्णवा रुज । ओ३म् वर्मीव धृष्णवा रुज ॥

यः । उस्रियाः । उ । स्रियाः । अपि । याः । अन्तः । अश्मनि । निः । गाः । अकृन्तत् । ओजसा । अभि । व्रजम् । तत्निषे । गव्यम् । अश्व्यम् । वर्मी । इव । धृष्णो । आ । रुज । ओ३म् । वर्मीवधृष्णवारुज ॥५८५॥

Samveda - Mantra Number : 585
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(धृष्णो) घर्षणशील (यः) जो सोम (उस्त्रियाः) गीली (अपियाः) अन्तरिक्ष में स्थित (गाः) किरणों को (अश्मनि अन्तः) मेघ के मध्य में स्थित हुइयों को (निरऽकृन्तत्) निकालता = वर्षाता है [वह सोम] (गव्यम्) गौवों के और (अश्व्यम्) घोड़ों के (व्रजम) समुदाय को (अभि तत्निषे) वर्षा से विस्तृत करता है। तथा (वर्मीव) कवचधारी वीर पुरुष सा (आ रुज) शत्रु दल को नष्ट करता है॥
Footnote
मन्त्र में () कोष्ठक का मध्यस्थ पाठ दो बार जो पढ़ा है, किन्हीं-किन्हीं पुस्तकों में है और अध्याय की समाप्ति सूचनाऽर्थ है॥
सोमयज्ञ से वर्षा, उससे तृणादि, उससे गौ आदि दुग्धदायक पशु और घोड़े आदि सवारियों की वृद्धि तथा सोम के सेवन से शत्रुनाशनयोग्य बल की प्राप्ति सुलभ ही है।
निघण्टु १। १०॥ २। ११॥ १। ३ निरुक्त ४। १९ अष्टाध्यायी ३। २। १०५ के प्रमाण और ऋ० ९। १०८। ६ के पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥