Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 583

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- शक्तिर्वासिष्ठः Chhand- ककुप् Swara- ऋषभः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
त्वं꣢ ह्या३꣱ङ्ग꣡ दै꣢व्यं꣣ प꣡व꣢मान꣣ ज꣡नि꣢मानि द्यु꣣म꣡त्त꣢मः । अ꣣मृतत्वा꣡य꣢ घो꣣ष꣡य꣢न् ॥५८३॥

त्व꣢म् । हि । अ꣣ङ्ग꣢ । दै꣣व्यम् । प꣡व꣢꣯मान । ज꣡नि꣢꣯मानि । द्यु꣣म꣡त्त꣢मः । अ꣣मृतत्वा꣡य꣢ । अ꣣ । मृतत्वा꣡य꣢ । घो꣣ष꣡य꣢न् ॥५८३॥

Mantra without Swara
त्वं ह्या३ङ्ग दैव्यं पवमान जनिमानि द्युमत्तमः । अमृतत्वाय घोषयन् ॥

त्वम् । हि । अङ्ग । दैव्यम् । पवमान । जनिमानि । द्युमत्तमः । अमृतत्वाय । अ । मृतत्वाय । घोषयन् ॥५८३॥

Samveda - Mantra Number : 583
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अंग) हे प्रिय ! (पवमान) पवित्र परमात्मन् ! वा सोम ! (त्वं हि) तू ही (द्युमत्तमः) अत्यन्त प्रकाशमान (दैव्यम्) विद्वानों के (जनिमानि) जन्मों को (अमृतत्वाय) मोक्षभाव के लिए (घोषयन्) विख्यात करता हुआ सा वर्त्तमान है॥
परमात्मा विद्वानों वा याज्ञिकों के जन्मों को मोक्षभाव के लिए विख्यात करता हुआ है। सोम भी जब अग्नि में हवन किया हुआ शब्द करता है तब यज्ञकर्त्ताओं के अन्तःकरण की शुद्धि के द्वारा उत्तरोत्तर ज्ञान की प्राप्ति से मानो मोक्ष को विख्यात करता है॥
Footnote
इसका विनियोग तीसरे दिन में है। ऋ० ९। १०८। ३ का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥