Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 58

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢꣫ यो रा꣣ये꣡ निनी꣢꣯षति꣣ म꣢र्तो꣣ य꣡स्ते꣢ वसो꣣ दा꣡श꣢त् । स꣢ वी꣣रं꣡ ध꣢त्ते अग्न उक्थशꣳ꣣सि꣢नं꣣ त्म꣡ना꣢ सहस्रपो꣣षि꣡ण꣢म् ॥५८॥

प्र꣢ । यः । रा꣣ये꣢ । नि꣡नी꣢꣯षति । म꣡र्तः꣢꣯ । यः । ते꣣ । वसो । दा꣡श꣢꣯त् । सः । वी꣣र꣢म् । ध꣣त्ते । अग्ने । उक्थशँसि꣡न꣢म् । उ꣣क्थ । शँसि꣡न꣢म् । त्म꣡ना꣢꣯ । स꣣हस्रपोषि꣡ण꣢म् । स꣣हस्र । पोषि꣡ण꣢म् ॥५८॥

Mantra without Swara
प्र यो राये निनीषति मर्तो यस्ते वसो दाशत् । स वीरं धत्ते अग्न उक्थशꣳसिनं त्मना सहस्रपोषिणम् ॥

प्र । यः । राये । निनीषति । मर्तः । यः । ते । वसो । दाशत् । सः । वीरम् । धत्ते । अग्ने । उक्थशँसिनम् । उक्थ । शँसिनम् । त्मना । सहस्रपोषिणम् । सहस्र । पोषिणम् ॥५८॥

Samveda - Mantra Number : 58
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वसो) सब में वास करने वाले ! (अग्ने) प्रकाशस्वरूप ! (यः मर्त्तः) जो मनुष्य (त्मना) अपने को (राये) विद्यादि धन के लिये (प्र, निनीषति) पहुँचाना चाहता है (यः) और जो कोई (ते) आपको (दाशत्) आत्मा का समर्पण करता है (सः) वह मनुष्य अपने को (सहस्रपोषिणम्) बहुतों को पालने वाला (उक्थशंसिनम्) स्तोत्रपाठी (वीरम्) और पुरुषार्थी (घत्ते) धारता — बनाता है॥ —
जो मनुष्य विद्यादि धन की प्राप्ति की इच्छा करता है और आत्मा को आप के समर्पित करता है, वह अपने को वीर, सर्वोपकारक और स्तोत्रपाठी बनाता है। अर्थात् परमात्मा की कृपा से वह इन लक्षणों से युक्त हो जाता है।
भौतिक पक्ष में:— (वसो) आठ वसुओं में एक (अग्ने) अग्ने ! (यः, मर्त्तः, त्मना, राये, प्र, निनीषति) जो, मनुष्य, अपने को, धनादि के लिये, पहुँचाना चाहता है (यः ते) जो तेरे लिये (दाशत्) हविः देता है (सः) वह मनुष्य अपने को (सहस्रपोषिणम्, उक्थशंसिनम्, वीरं, धत्ते) सर्वोपकारक, स्तोत्रपाठी और वीर बनाता है॥
Footnote
निघण्टु ३।२०॥ २।३॥ ३।१॥ अष्टाध्यायी ६।४।१४१ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद ८।१०३।४ में “प्र यं राये निनीषसि” ऐसा पाठ और अर्थ में भी भेद है॥