Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 572

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्निश्चाक्षुषः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
सो꣡मः꣢ पुना꣣न꣢ ऊ꣣र्मि꣢꣫णाव्यं꣣ वा꣢रं꣣ वि꣡ धा꣢वति । अ꣡ग्रे꣢ वा꣣चः꣡ पव꣢꣯मानः꣣ क꣡नि꣢क्रदत् ॥५७२॥

सो꣡मः꣢꣯ । पु꣣नानः꣢ । ऊ꣣र्मि꣡णा꣢ । अ꣡व्य꣢꣯म् । वा꣡र꣢꣯म् । वि । धा꣣वति । अ꣡ग्रे꣢꣯ । वा꣣चः꣢ । प꣡व꣢꣯मानः । क꣡नि꣢꣯क्रदत् ॥५७२॥

Mantra without Swara
सोमः पुनान ऊर्मिणाव्यं वारं वि धावति । अग्रे वाचः पवमानः कनिक्रदत् ॥

सोमः । पुनानः । ऊर्मिणा । अव्यम् । वारम् । वि । धावति । अग्रे । वाचः । पवमानः । कनिक्रदत् ॥५७२॥

Samveda - Mantra Number : 572
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(पुनानः) पवित्र और (पवमानः) अन्यों को पवित्र करने वाला (सोमः) सोम (ऊर्मिणा) लहरों के साथ (अव्यम्) ऊन के (वारम्) दशापवित्र को (विधावति) विविध प्रकार से चलता है। तथा (वाचः) वेद मन्त्रोच्चारण के (अग्रे) आगे [साथ-साथ] (कनिक्रदत्) शब्द करता है॥
अथवा —(पुनानः) स्वयं पवित्र और (पवमानः) अन्यों को पवित्र करने वाला (सोमः) शान्त आत्मा (ऊर्मिणा) मानस उन्नति से (अव्यं बारम्) सूर्य के मण्डल को (विधावति) विशेष कर प्राप्त होता है।
Footnote
इसका विनियोग चौथे दिन में है।
ऋ० ९। १०६। १० में श्रव्यः पाठ है॥